कभी रेशम नगरी के नाम से मशहूर मुबारकपुर कस्बा आज अपनी पहचान को तरस रहा है। यहां बनी रेशमी साड़ियां बनारसी साड़ियों के नाम से बिकती हैं, और मुबारकपुर अनचीन्हा रह जाता। इसके बाद भी यहां हमेशा हालात ऐसे नहीं थे। मगर एक दंगे ने यहां की तस्वीर बदल दी।
सरकार ने कुछ योजनाओं की घोषणा की पर उनका बिचौलिये ले जाते हैं और बुनकरों के हाथ रीते ही रह जाते हैं।
कभी हथकरघे की खटर-पटर की मधुर धुन से कस्बे के आस पास का पूरा क्षेत्र गूंजता था। लेकिन एक दंगे की काली छाया ने यहां के उद्योग की नींव हिला दी।
बुनकरों का कहना है कि दंगे के बाद से बाहर से आने वाले व्यापारी काफी कम हो गए। माल बिकना कम हो गया। ब्रिकी घटी तो बेकारी पांव पसारने लगी। जिन घरों में पहले 12-12 हथकरघे चलते थे वहां चार छह करघों का चला पाना कठिन हो गया। इसका फायदा बिचौलियों ने उठाया। मजबूर बुनकरों का माल औने पौने दाम में खरीदने लगे। परिवार की रोटी चले इसलिए बुनकर इन्हीं पर निर्भर होते गए और काम टूटता गया।
बुनकरी में प्रयोग होने वाला सामान इतना महंगा हो गया कि नए उद्यमी इसमें हाथ डालने से कतराने लगे। सरकारी योजनाओं का लाभ भी बिचौलियों तक ही सीमित होकर रह गया। जिसके कारण कस्बे के युवक रोजगार की तलाश में खाड़ी देशों और अन्य प्रांतों की ओर रूख करने लगे।