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इस्लाम में औरतों के अधिकारों का हनन नहीं

Sun, 22 Nov 2015 11:40 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, आजमगढ़
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पश्चिमी देशों के विद्वानों आरोप लगाते हैं कि इस्लाम में औरतों के अधिकारों का हनन हो रहा है। यह पूरी तरह से गलत है। हजरत मोहम्मद साहब के दौर से ही औरतों को अपना अधिकार और समाज में इज्जत मिली है। यह बातें कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रोफेसर एवं डीडी न्यूज कोलकाता की न्यूज रीडर नुसरत जहां ने कहीं। वह रविवार को शिब्ली नेशनल पीजी कालेज में शिरत-ए-उम्मत-उल-मोमनीन (हजरत मोहम्मद साहब की पत्नियों के उदात्त चरित्र) विषय पर अंतरराष्ट्रीय सेेमिनार को संबोधित कर रही थीं।
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जामिया मिलिया इस्लामिया नई दिल्ली की उर्दू एसोसिएट डा. आबिदा कौशर ने कहा कि हजरत मोहम्मद साहब के दौर में मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने की पूरी छूट थी मगर वर्तमान अब ऐसा नहीं है। कुछ महिलाओं को माल, पर्यटन केंद्र, सिनेमाघर से फुर्सत ही नहीं मिल रही है। कहा कि इस्लाम ने जिस तरह औरतों को पर्दे में रहने की इजाजत दी है उसी तरह पुरुषों को भी दायरे में रहने को कहा गया है। औरतों को देखते ही अपना हो या पराया उसे सिर झुकाने को कहा गया है।

प्रथम सत्र की अध्यक्षता कर रहे गोरखपुर विश्वविद्यालय उर्दू विभागाध्यक्ष के डा. रजीउर्रहमान ने कहा कि जो भी यहां शोधपत्र प्रस्तुत किए गए हैं वह आलोचनात्मक नहीं बल्कि अर्थवत्ता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। दूसरे सत्र की अध्यक्षता कर मौलाना ताहिर मदनी ने कहा कि समाज के उत्थान के लिए औरत और मर्द दोनों की सहभागिता होनी होनी चाहिए, तभी एक अच्छे समाज का निर्माण हो सकता है।
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सम्मेलन को डा. तारिक सईद, डा. जावेद अख्तर, डा. रिजवान अहमद, डा. शर्फुद्दीन, मोहम्मद नाजिम, डा. अतिकुर्रहमान ने भी संबोधित किया। प्रथम सत्र का संचालन एखलाक अहमद ने और दूसरे सत्र का डा. मोहम्मद ताहिर ने किया। इस मौके पर महाविद्यालय के डा. जहूर आलम, डा. सलमान अंसारी, डा. आलमगीर, डा. मुनीर अहमद, डा. फहमीदा जैदी, डा. जावेद, डा. ए.जेड. अली, डा. तारिक उस्मानी, डा. शफकत अलाउद्दीन आदि उपस्थित रहे।
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