आजमगढ़। जनपद में 177 किमी लंबे वाराणसी-लुंबिनी एनएच-233 को तीन पैच में तैयार कर अप्रैल 2020 तक उपयोग के लिए जनता को पूर्ण रूप से समर्पित करने की योजना बनाई गई है। इसमें कार्यदायी संस्था को एक पैच दिसंबर, दूसरा फरवरी और तीसरा अप्रैल तक तैयार कर देना होगा। डेटलाइन का कड़ाई से पालन करने के निर्देश जिलाधिकारी एनपी सिंह ने कार्यदायी संस्था को दिया है।
एनएच-233 वाराणसी से शुरू होकर आजमगढ़ में गोमाडीह, बूढनपुर, अतरौलिया होते हुए लुंबिनी को जा रही है। जनपद में इसकी लंबाई लगभग 177 किमी है, जिसका कार्य प्रगति पर है। जनपद में दो कंपनियों की ओर से इसका निर्माण किया जा रहा था। इसमें एक कंपनी दिलीप बिल्डकान अपना काम पूरा कर चुकी है। दूसरी कंपनी गायत्री प्रोजेक्ट का कार्य अभी बाकी है। कंजहित से लेकर अतरौलिया तक लगभघ 7.7 किमी की सड़क का निर्माण कार्य विभिन्न कारणों से बाधित है। इसमें लगभग चार किमी के हाईवे के लिए एनएच को सीधे किसानों से जमीन खरीदनी है, जो अभी नहीं हो सकी है। वहीं, जिला प्रशासन को तीन किमी सड़क के लिए जमीन किसानों से खाली कराई जानी है। इसके लिए 20 अक्तूबर की समय सीमा रखी गई है। 20अक्तूबर तक जिला प्रशासन भूमि को खाली करा एनएच के सुपुर्द कर देगा।
कार्यदायी संस्था गायत्री प्रोजेक्ट को हाईवे की निर्माण तीन पैच में पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं। इसमें बूढ़नपुर से ब्रह्मस्थान तक तक का पैच संस्था को दिसंबर माह में पूरी तरह तैयार करना है। ब्रह्मस्थान से गोसाईं की बाजार तक का पैच संस्था को 30 अप्रैल तक तैयार करना है। गोसाईं की बाजार से कंजहित तक का पैच संस्था को 28 फरवरी तक तैयार करना है। जिसा चार किमी की जमीन एनएच को खरीदनी है उसमें अधिकतर बाईपास की जमीन है। इसके लिए तेजी लाने के निर्देश दिए गए हैं। कप्तानगंज में बिजली विभाग के टावर और कंजहित में बिजली विभाग के सब स्टेशन के स्थानांरित करने के लिए प्रयास किा जा रहा है। इसके कारण भी निर्माण बाधित है। डीएम एनपी सिंह ने बताया कि अप्रैल 2020 तक एनएच-233 को पूरी तरीके से चालू करा दिया जाएगा। जिस तीन किमी सड़क के लिए जमीन जिला प्रशासन की ओर खाली करानी है उस पर मकान है। बारिश की वजह से उन्हें समय दिया गया था। 20 अक्तूबर तक इसे खाली करा लिया जाएगा।
2015-16 से हो रहा निर्माण
आजमगढ़। जनपद में वाराणसी-लुंबिनी नेशनल हाईवे 233 का निर्माण वर्ष 2015-16 में सपा सरकार के समय शुरू हुआ था। 177 किमी लंबे हिस्से के लिए 144 गांव के किसानों से लगभग 400 हेक्टेयर भूमि खरीदी गई थी। इसके लिए लगभग तीन हजार करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था।