मेंहनगर/रानी की सराय। जिले के ऐतिहासिक स्थलों की विरासत को संरक्षित रखने के लिए जिम्मेदारों ने कोई कदम नहीं उठाया है। नतीजा जिले के कई पुरातन महत्व के स्थल बदहाल हो रहे हैं। इनमें रानी की सराय और दौलत खां का मकबरा प्रमुख है।
यहां महज पुरातत्व विभाग और पर्यटन के बोर्ड लगा दिए गए हैं। सिर्फ कागजों में ही संरक्षण किया जा रहा है। जिले को पहचान दिलाने वाले प्राचीन स्थलों को संरक्षित करने के लिए न तो कोई मजबूत कार्ययोजना बनती दिख रही है और न तो इनके सौंदर्यीकरण का काम हो रहा है। प्रस्तुत है अमर उजाला की एक रिपोर्ट...।
जानकारी के मुताबिक, मुगल शासक जहांगीर ने अपने शासन काल में सिपहसालार अभिमन्यु सिंह के साहस और सूझबूझ से प्रसन्न होकर बिहार के बक्सर से लेकर जौनपुर तक का विस्तृत क्षेत्र उन्हें दे दिया था।
अभिमन्यु सिंह ने राज्य के संचालन के लिए आजमगढ़ के मेंहनगर को राजधानी बनाया। साथ ही भव्य किला बनवाया। अभिमन्यु ने 44 वर्षों के शासन काल के बाद राज्य के संचालन की जिम्मेदारी भाई चंद्रसेन सिंह के पुत्र हरिवंश को सौंपकर स्वयं इस्लाम कबूल कर लिया। इस्लाम कुबूल करने के बाद अभिमन्यु इब्राहिम दौलत खां ने नाम से जाने गए।
इंतकाल के बाद इब्राहिम दौलत खां और उनके प्रिय घोड़े के साथ ही वफादार कुत्ते को मेंहनगर कस्बे के उत्तरी भाग में दफन किया गया जो बाद में इब्राहिम दौलत खां के मकबरे के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वहीं, हरिवंश ने भी चाचा दौलत खां से प्रभावित होकर इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। हरिबंश सिंह ने तो इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया लेकिन उनकी पत्नी रानी रत्न ज्योति कुंवर ने सनातन धर्म को नहीं छोड़ा। वे अपने पति को छोड़कर 20 किमी दूर सेठवल गांव पहुंची, जो उन्हें प्रिय लगा। उन्होंने 52 एकड़ भूमि राजा से मांग ली और यहीं रहने लगी जो आज रानी की सराय नाम से जाना जाता है।