आजमगढ़। मदर्स डे के अवसर पर अमर उजाला उस मां को सलाम करता है जिसने लोगों की जान बचाने के लिए अपने दो मासूम बच्चों तक की परवाह नहीं की। इस कार्य उनका साथ ही उनके पति ने, जो बच्चों बहलाने के लिए कभी घोड़ा बनते थे कभी टीवी के जरिए उन्हें बहलाने की कोशिश करते थे।
सीतापुर जनपद की रहने वाले आशा सिंह पत्नी धरमवीर सिंह ने 2009 में मेडिकल कालेज चक्रपानपुर में स्टाफ नर्स की नौकरी ज्वाइन की। इनके पति धरमवीर सिंह लखनऊ में रहकर विजनेस करते हैं। लाक डाउन घोषित होने के बाद वह 22 मार्च को आजमगढ़ आ गए। आठ अप्रैल को आशा सिंह की ड्यूटी आइसोलेशन वार्ड में लग गई। उनके पास दो छोटे बच्चे पांच वर्षीय आदित्य प्रताप सिंह और दो वर्षीय शौर्य प्रताप सिंह हैं। उन्हें अपने पति के सहारे छोड़कर आशा सिंह आइसोलेशन वार्ड में कैद हो गई। जहां 14 अप्रैल तक रहीं। वहां से निकलने के बाद उन्हें 28 अप्रैल तक के लिए क्वारंटीन सेंटर भेज दिया गया। वहां से वह 29 अप्रैल को घर पहुंची। आशा सिंह ने बताया कि अगर उनके पति नहीं होते तो उनका ड्यूटी करना मुश्किल हो जाता क्योंकि अपने छोटे बच्चों को वहां छोड़ती।जब भी बच्चे परेशान करते थे पति वीडियो काल के माध्यम से उनसे बात कराते थे। बच्चों से दूर रहने का जो कष्ट होता था उनका चेहरा देखने के बाद काफी हद तक कम हो जाता था। जब घर आई और बच्चों से मिली तो ऐसा लगा जैसे सारा जहां मिल गया।
आशा सिंह के पति धरमवीर सिंह ने बताया कि बच्चे छोटे हैं इसलिए इनको संभालना कठिन काम था। जब यह अपनी मां से मिलने की जिद करते थे तो टीवी दिखाकर, इनके साथ घोड़ा बनकर खेलता था। इनका सारा काम मैं करता था। जब बच्चे ज्यादा परेशान करते थे तो आशा से फोन पर वीडिओ काल के माध्यम से बात कराता था बच्चे शांत हो जाते थे। लेकिन अब सबकुछ ठीक है और मुझे अपनी पत्नी पर गर्व है।
- अंबुज राय