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ग्राउंड रिपोर्ट आजमगढ़: समस्याएं तमाम, चर्चा भी मुद्दों पर मगर वोट जाति पर; गवाह हैं 2014-2019 के आंकड़े

Sat, 25 May 2024 11:45 AM IST
प्रगति चंद राहुल दुबे, आजमगढ़।

सार

Lok Sabha Election 2024 : लोकसभा चुनाव को लेकर छठे चरण का मतदान शनिवार को शुरू हो गया। इसी क्रम में बात करें आजमगढ़ जिले की दूसरी लोकसभा सीट लालगंज की तो यहां पर समस्याएं तो तमाम हैं और चर्चा भी मुद्दों पर होता पर वोट जाति पर पड़ता है। 
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आजमगढ़ के दिलौरी पंचायत भवन में चुनाव पर चर्चा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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आजमगढ़ जिले की दूसरी लोकसभा सीट लालगंज की पांचों विधानसभा पर सपा का कब्जा है। भाजपा ने यहां 2014 में जीत हासिल की थी, मगर 2019 के चुनाव में बसपा ने यहां परचम लहरा दिया।

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भाजपा इस सीट को दोबारा वापस लेने के लिए आतुर है। यही कारण है कि 2019 में बसपा के टिकट पर जीत हासिल करने वाली संगीता आजाद को भाजपा ने इस चुनाव में अपने खेमे में मिला लिया है। इसे भाजपा का बड़ा मास्टर स्ट्रोक के रूप में देखा जा रहा है। यह प्रभावी कितना होगा यह तो परिणाम ही बताएंगे मगर सपा से यहां कड़ी टक्कर मिल रही है तो बसपा कैडर वोट को साध रही है। मुद्दे बहुत हैं, चर्चाएं भी लोग कर रहे हैं मगर चर्चाओं का नतीजा जाति पर वोट देने का निकलता है।

सड़क से सटे गांवों में बात करें या फिर चाय की दुकानों पर। वोट का नाम लेते ही मतदाता भड़क जाते हैं। कहते हैं क्यों दें वोट और किसे दें। कोई विकास कार्य नहीं हुआ। योगी सरकार की एक तारीफ भी करते हैं कि अब गुंडागर्दी नहीं होती है। समस्याएं तमाम गिनाते हैं मगर अंत में मामला जाति पर अटकता है। सवर्ण, ओबीसी और दलित मतदाता पार्टी के प्रत्याशी नहीं बल्कि पार्टी के नाम पर वोट देने की बात करते हैं।

भले 2019 का चुनाव बसपा ने जीता हो मगर सीधी लड़ाई सपा और भाजपा में दिखाई देती है। इन दोनों दलों में जो बसपा के कैडर वोट में सेंध लगा ले गया जीत उसी के हिस्से में जाएगी। भाजपा के नेता जीत के बड़े दावे जरूर कर रहे हैं मगर सपा ने भी मजबूती से पकड़ बना रखी है। वहीं बसपा का दावा है कि वह सपा के वोट बैंक में सेंधमारी कर फिर एक बार जीत का परचम लहरा देगी।

आजमगढ़ के एक वरिष्ठ सपा नेता यह मानते हैं कि लालगंज में चुनाव प्रचार में भाजपा ने बाजी मार ली है, मगर वह यह भी कहते हैं कि इस बार भाजपा सपा के वोट बैंक में उस तरह से सेंध नहीं लगा पाएगी जैसे 2014 के चुनाव में लगाकर जीत हासिल कर ली थी। भाजपा यह मानकर चल रही है कि सवर्ण वोट के अलावा ओबीसी में गैर यादव सभी उसके साथ खड़े हैं और यादव वोट बैंक में भी उसने सेंधमारी की है। दलित वोट में उसने राशन योजना के सहारे बढ़त बनाई है। वहीं बसपा का दावा है कि इस बार दलित वोट कहीं नहीं जा रहा है और उसी के बलबूते वह एक बार फिर लालगंज में जीत हासिल करेगी।
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सबसे अधिक मुस्लिम यादव और दलित

समीकरण देखा जाए तो यादव, मुसलमान और दलित वोटर ही निर्णायक रहते हैं। इसके अलावा राजभर वोट महत्वपूर्ण हैं और फिर खटिक, पासी, ब्राहमण, वैश्य, अन्य ओबीसी व अनुसूचित जाति के मतदाता शामिल हैं।

अफसर गांव नहीं आते, सफाई नहीं, सड़क नहीं
गांव दिलौरी के रघुनाथ शुक्ला कहते हैं कि वोट दें या न दें, कोई सुनने वाला तो है नहीं। राहत बस यही है अब गुंडागर्दी नहीं होती है। युवा मतदाता निशांत कहते हैं कि गांव में एक साल से सफाई कर्मी नहीं है। राशन में घटतौली है। अफसरों से शिकायत करो तो सुनते नहीं है। कभी कोई अफसर, नेता गांव में आया ही नहीं। शिवम तिवारी कहते हैं कि छोटी ग्राम सभा है। बमुश्किल एक हजार वोट हैं। सभी बिरादरी हैं तो सब अपनी अपनी जाति को वोट करते हैं जबकि आवास मिलने तक में पैसा देना पड़ा है। बीडीओ कभी गांव नहीं आए पूछ तो नक्शा में देखकर बताएंगे। सीताराम और चंद्रचूण बताते हैं कि सड़क, पानी बड़ा मुद्दा है खासकर सभी ग्राम पंचायतों में मगर उस ओर किसी का ध्यान नहीं है। सीएचसी-पीएचसी का हाल अच्छा नहीं है, मगर न ही जनप्रतिनिधि सुनते हैं और न ही अफसर।
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