तीन महीने बाद सियाचिन ग्लेशियर से नीचे आने के बाद 1999 में कारगिल जंग शुरू हो गई जहां इनकी पलटन को कारगिल युद्ध में भेज दिया गया। यहां उन्होंने अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए दुश्मनों से कड़ा मुकाबला किया और जंग में लड़ते हुए 30 अगस्त 1999 को शहीद हो गए।
इसे दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य जिस तारीख को जन्म हुआ उसी तारीख 30 अगस्त को मात्र 22 वर्ष की उम्र में शहीद हुए। उनके शहीद होने के बाद उनके गांव में सरकार की ओर से शहीद पार्क का निर्माण कराया गया, जहां शहीद रामसमुझ यादव की भव्य आदमकद प्रतिमा स्थापित है। प्रतिवर्ष 30 अगस्त को यहां पर उनका शहीद दिवस धूमधाम से मनाया जाता है।