निजामाबाद। हिंदी खड़ी बोली को पहचान दिलाने वाले कवि सम्राट अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की जयंती पर उन्हें याद करने वाले कम ही नजर आए। उनकी जयंती पर जिले के किसी भी साहित्यकार ने उन्हें एक फूल अर्पित करना भी मुनासिब नहीं समझा।
15 अप्रैल, 1865 को निजामाबाद कस्बे के एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे इस महाकवि की जन्मस्थली आज भी खंडहर में तब्दील है। हरिऔध के पिता भोला सिंह और माता रुक्मिणी थीं। अस्वस्थ होने के कारण स्कूली शिक्षा अधूरी रहने पर उन्होंने घर पर ही उर्दू, संस्कृत, फारसी, बंगाली और अंग्रेजी का अध्ययन किया। 1883 में निजामाबाद के मिडिल स्कूल में हेडमास्टर बने, 1890 में कानून की परीक्षा पास कर कानूनगो बने, और 1923 में बीएचयू में प्राध्यापक के रूप में कार्य किया।
हरिऔध ने हिंदी कविता को नई ऊंचाइयां दीं। उनके महाकाव्य प्रियप्रवास ने खड़ी बोली को पहला महाकाव्य प्रदान किया। संस्कृत छंदों का हिंदी में सफल प्रयोग और चोखे चौपदे, चुपदे चौबदे जैसे रचनाओं में उर्दू मुहावरों का समावेश कर उन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। उनकी रचनाओं को हिंदी कविता के विकास में मील का पत्थर माना जाता है।
उनकी जन्मस्थली पर कई बार वहां पुस्तकालय बनाने की मांग उठी, लेकिन यह अधूरी रही। निजामाबाद बाईपास पर स्थापित उनकी एकमात्र आदमकद प्रतिमा भी उपेक्षा का शिकार है। कुछ हिंदी प्रेमी समय-समय पर उन्हें याद करते हैं, लेकिन साल भर उनकी स्मृति विस्मृत-सी रहती है। 16 मार्च, 1947 को इस महान कवि का निधन हुआ, लेकिन उनकी विरासत को संजोने के प्रयास अभी भी अधूरे हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र हरि पाण्डेय ने बताया कि हम निजी कार्य से इस समय मुंबई में हैं। जब उन्होंने यह सुना कि हरिऔध जी की जयंती पर आज उनके जन्मस्थान पर कुछ नहीं हुआ तो उन्होंने खेद जताते हुए कहा कि यह बड़ी चिंता की बात है। कथा सम्राट की इस तरह उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। साहित्यकारों को जरूर जन्मस्थली पर पहुंचना चाहिए और उन्हें याद करना चाहिए।
भाजपा के जिला मंत्री संतोष गोड़ का कहना है कि कवि सम्राट अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की जन्मस्थली निजामाबाद में है। आज उनकी जयंती पर किसी भी साहित्यकार के न पहुंचने पर हम लोग दुखी हैं। जबकि कस्बा बहुत बड़ा है, आसपास के बहुत से लोग हिंदी साहित्य से जुड़े हुए हैं। उसके बावजूद भी आज कवि सम्राट अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध के जन्मदिवस के अवसर पर हिंदी साहित्य से जुड़े साहित्यकारों का न पहुंचना दुखद है।