पछुआ बयार के बीच पूर्वांचल की हॉट सीटों में शुमार आजमगढ़ सदर लोकसभा क्षेत्र में चुनावी बिसात बिछ गई है। वैसे तो मुख्य मुकाबला सपा और भाजपा के यादव उम्मीदवारों के बीच होने के आसार हैं, लेकिन बसपा से मजबूत प्रत्याशी उतारा गया तो मुकाबला त्रिकोणीय भी हो सकता है। सियासत और साहित्य के गढ़ में दोनों के लिए यह चुनाव साख की लड़ाई है। हाल ही में यहां हवाई अड्डा शुरू होने से विकास को उड़ान मिलने की उम्मीद बढ़ गई है, हालांकि जातीय समीकरण की जड़ें इतनी गहरी हैं कि अन्य मुद्दे गौण दिख रहे हैं। इस सीट से 14 बार यादव तो तीन बार मुस्लिम चेहरे दिल्ली पहुंच चुके हैं।
बसपा समर्थकों को नए उम्मीदवार का इंतजार
दूसरी तरफ बसपा ने अपने उम्मीदवार भीम राजभर को आजमगढ़ से सलेमपुर शिफ्ट कर दिया है। ऐसे में अब बसपा समर्थकों को नए उम्मीदवार का इंतजार है। भाजपा और सपा के उम्मीदवार दूसरे जिले के हैं। ऐसे में बसपा किसी स्थानीय नेता पर दांव खेल कर मुकाबला त्रिकोणीय बना सकती है। आकाश आनंद की जनसभाओं से आस है। उन्हें विश्वास है कि बसपा के पारंपरिक मतदाताओं का वोट मिलेगा।
चुनावी हवा को भांप आजमगढ़ के वरिष्ठ कवि राजाराम सिंह लिखते हैं-
मौसम चढ़ा चुनाव का, पछुआ बही बयार।
सारे मुद्दे उड़ गए, बढ़ी रार-तकरार।।
पहली बार मतदाता बनीं छात्राओं की सोच
मालटाली स्थित श्री गांधी पीजी कॉलेज की छात्रा अर्चना प्रजापति समेत फर्स्ट टाइम वोटर बनीं अन्य छात्राएं कहती हैं कि जो शिक्षा और रोजगार दिलाने में सक्षम उम्मीदवार होगा, उन्हीं को वे वोट देंगी। छात्राएं कहती हैं कि अब भी समाज में महिलाएं दबी हुई हैं। शिक्षा से ही इसका समाधान संभव है। वैसे तो जनसंख्या के हिसाब से पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या ज्यादा है, लेकिन मतदाताओं के रूप में उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम है।
जातीय समीकरणों में दब गए मुद्दे
आजमगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश प्रसाद बरनवाल 'कुंद' बताते हैं कि इस जिले से दो केंद्रीय मंत्री, दो राज्यपाल, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री के अलावा राज्य सरकार में कई मंत्री बन चुके हैं। आजमगढ़ ने महिलाओं को सांसद बनने का मौका दिया है। इस बार फिर जातीय समीकरण की वजह से मुद्दे दब गए हैं। अब कोई चमत्कार हो, तभी सियासी हवा का रुख बदल सकता है। वहीं, दारुल मुसन्नेफिन शिबली एकेडमी के सीनियर रिसर्च फेलो उमैर सिद्दीक नदवी कहते हैं कि मौजूदा समय में देश को जोड़ने वाली राजनीति होनी चाहिए।
भाजपा : दिनेश लाल यादव
मूल रूप से गाजीपुर के हैं और मौजूदा सांसद हैं। इस सीट से तीसरी बार चुनाव मैदान में उतरे हैं। रूठे कार्यकर्ताओं को मनाने के अलावा यादव मतदाताओं को अपनी ओर मोड़ने की चुनौती है। परंपरागत वोटर-सवर्ण, बनिया और अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाता भाजपा के साथ दिख रहे हैं।
सपा : धर्मेंद्र यादव
मूल रूप से सैफई के हैं और आजमगढ़ लोकसभा सीट पर दूसरी बार चुनाव मैदान में उतरे हैं। सपा के बिखरे मतदाताओं को एकजुट करना उनकी सबसे बड़ी चुनौती है। मुस्लिम-यादव वोटरों का सपा की ओर झुकाव इनका मजबूत पक्ष है। पांच विधानसभा क्षेत्रों में सपा का विधायक होना भी इनकी ताकत है।