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Ground Report Azamgarh : सियासी गढ़ में साख की लड़ाई, आजमगढ़ सीट पर सपा और भाजपा में सीधी टक्कर

Sun, 28 Apr 2024 06:01 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमरनाथ, आजमगढ़

सार

वैसे तो मुख्य मुकाबला सपा और भाजपा के यादव उम्मीदवारों के बीच होने के आसार हैं, लेकिन बसपा से मजबूत प्रत्याशी उतारा गया तो मुकाबला त्रिकोणीय भी हो सकता है।
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इन्होंने की पहली बार मतदान की तैयारी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पछुआ बयार के बीच पूर्वांचल की हॉट सीटों में शुमार आजमगढ़ सदर लोकसभा क्षेत्र में चुनावी बिसात बिछ गई है। वैसे तो मुख्य मुकाबला सपा और भाजपा के यादव उम्मीदवारों के बीच होने के आसार हैं, लेकिन बसपा से मजबूत प्रत्याशी उतारा गया तो मुकाबला त्रिकोणीय भी हो सकता है। सियासत और साहित्य के गढ़ में दोनों के लिए यह चुनाव साख की लड़ाई है। हाल ही में यहां हवाई अड्डा शुरू होने से विकास को उड़ान मिलने की उम्मीद बढ़ गई है, हालांकि जातीय समीकरण की जड़ें इतनी गहरी हैं कि अन्य मुद्दे गौण दिख रहे हैं। इस सीट से 14 बार यादव तो तीन बार मुस्लिम चेहरे दिल्ली पहुंच चुके हैं।

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पिछले चुनावों की बात करें तो 2014 के चुनाव में मोदी लहर के बावजूद मुलायम सिंह यादव यहां से सांसद बने थे। इस सीट से 2019 में बसपा के समर्थन से सपा के अखिलेश यादव भारी मतों से जीते थे। इस बार विपक्षी गठबंधन इंडिया के उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे धर्मेंद्र यादव सपा की खोई हुई पारंपरिक सीट को वापस हासिल करने के लिए पुरजोर कोशिश करते दिख रहे हैं।

  • मुलायम और अखिलेश से जुड़ी इस सीट को जीतना सैफई परिवार के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है। इसे देखते हुए सपा ने चुनाव से पहले शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को विधान परिषद का सदस्य बनाकर बड़ा दांव खेला है। 2022 के उपचुनाव में बसपा के उम्मीदवार रहे शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को 27.81 प्रतिशत मत मिले थे, जो उपचुनाव में सपा नेता धर्मेंद्र यादव की हार का बड़ा कारण बना था। इस बार जमाली के समर्थकों को साधने के अलावा सपा यादव और अन्य मुस्लिम वोटरों को एकजुट करती दिख रही है।
  • वहीं, 2022 के उपचुनाव में 8679 वोटों से जीत हासिल कर चुके भाेजपुरी सिने स्टार दिनेश लाल यादव निरहुआ अपनी कुर्सी को बरकरार रखने के लिए जद्दोजहद करते दिख रहे हैं। निरहुआ लगातार जनता के बीच अपनी उपस्थिति दर्शाकर, विकास कार्यों को गिनाकर, सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को वोट में तब्दील करने की कोशिश करते दिख रहे हैं। चुनावी माहौल को अपने पक्ष में करने के लिए भाजपाइयों को अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से चमत्कार की उम्मीदें हैं। 

बसपा समर्थकों को नए उम्मीदवार का इंतजार
दूसरी तरफ बसपा ने अपने उम्मीदवार भीम राजभर को आजमगढ़ से सलेमपुर शिफ्ट कर दिया है। ऐसे में अब बसपा समर्थकों को नए उम्मीदवार का इंतजार है। भाजपा और सपा के उम्मीदवार दूसरे जिले के हैं। ऐसे में बसपा किसी स्थानीय नेता पर दांव खेल कर मुकाबला त्रिकोणीय बना सकती है। आकाश आनंद की जनसभाओं से आस है।   उन्हें विश्वास है कि बसपा के पारंपरिक मतदाताओं का वोट मिलेगा।

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मुद्दे और प्रचार की स्थिति
इस सीट पर मतदान 25 मई को है। क्षेत्र में चुनावी रंगत अभी पूरी तरह चढ़ी नहीं है। तीन तलाक, समान आचार संहिता, राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा की चर्चा नहीं के बराबर है। न पोस्टर वार है और न ही प्रचार का उतना शोर है। उम्मीद जताई जा रही है कि नामांकन होने के बाद स्टार प्रचारक अपने-अपने उम्मीदवार के पक्ष में माहौल बनाने में कामयाब होंगे। 

  • क्षेत्र में लोग सबसे पहले जातीय समीकरण पर ही बात करते हैं। अलबत्ता कुरेदने के बाद लोग बेरोजगारी और महंगाई को प्रमुख मुद्दा बताते हैं। सठियांव सहकारी चीनी मिल समय से पहले बंद हो गई है। गन्ने का रकबा घटा, तो मिल भी घाटे में चली गई। नए उद्योग-धंधे शुरू हों, तभी लोगों को रोजगार बढ़ने की उम्मीद है। 
  • इस लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाले पांच विधानसभा क्षेत्रों में से दो में लोगों को घाघरा की बाढ़ की विभीषिका भी झेलनी पड़ती है। ऐसे में प्रबुद्ध लोग वेटलैंड बनाकर जल प्रबंधन करने की बात उठा रहे हैं।


चुनावी हवा को भांप आजमगढ़ के वरिष्ठ कवि राजाराम सिंह लिखते हैं-
मौसम चढ़ा चुनाव का, पछुआ बही बयार।
सारे मुद्दे उड़ गए, बढ़ी रार-तकरार।।


पहली बार मतदाता बनीं छात्राओं की सोच
मालटाली स्थित श्री गांधी पीजी कॉलेज की छात्रा अर्चना प्रजापति समेत फर्स्ट टाइम वोटर बनीं अन्य छात्राएं कहती हैं कि जो शिक्षा और रोजगार दिलाने में सक्षम उम्मीदवार होगा, उन्हीं को वे वोट देंगी। छात्राएं कहती हैं कि अब भी समाज में महिलाएं दबी हुई हैं। शिक्षा से ही इसका समाधान संभव है। वैसे तो जनसंख्या के हिसाब से पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या ज्यादा है, लेकिन मतदाताओं के रूप में उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम है।

  • आजमगढ़ से करीब 33 किलोमीटर दूर लाटघाट में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले इंद्रजीत बताते हैं कि परीक्षा के नतीजे सही समय पर नहीं आते। बेरोजगार युवा हतोत्साहित हो रहे हैं। वहीं, सगड़ी में मिले युवा वकील रवि कुमार गौतम कहते हैं कि मुलायम और अखिलेश का यहां के विकास में अधिक योगदान रहा है। यहां से कुछ दूर जूस बेचने वाली बुजुर्ग महिला आशा कहती हैं कि प्रति माह 1000 रुपये पेंशन मिलती है, इससे गुजारा करना मुश्किल है। परिवार के लोग जिसे कहेंगे, उसे वोट दे देंगे।
  • रेशमीनगर मुबारकपुर में मिले बुनकर इफ्तेकार अहमद व्यथा सुनाते हुए कहते हैं, हुनरमंदों की स्थिति मजदूरों से बदतर है। यहां के 20 हजार से अधिक बुनकर पलायन कर गए। सरकार मदद करे तो स्थिति सुधर सकती है। मुस्लिम बहुल अन्य इलाकों में भी सपा के प्रति मतदाताओं का रुझान अधिक देखने को मिला। 

जातीय समीकरणों में दब गए मुद्दे
आजमगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश प्रसाद बरनवाल 'कुंद' बताते हैं कि इस जिले से दो केंद्रीय मंत्री, दो राज्यपाल, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री के अलावा राज्य सरकार में कई मंत्री बन चुके हैं। आजमगढ़ ने महिलाओं को सांसद बनने का मौका दिया है। इस बार फिर जातीय समीकरण की वजह से मुद्दे दब गए हैं। अब कोई चमत्कार हो, तभी सियासी हवा का रुख बदल सकता है। वहीं, दारुल मुसन्नेफिन शिबली एकेडमी के सीनियर रिसर्च फेलो उमैर सिद्दीक नदवी कहते हैं कि मौजूदा समय में देश को जोड़ने वाली राजनीति होनी चाहिए।

भाजपा : दिनेश लाल यादव  
मूल रूप से गाजीपुर के हैं और मौजूदा सांसद हैं। इस सीट से तीसरी बार चुनाव मैदान में उतरे हैं। रूठे कार्यकर्ताओं को मनाने के अलावा यादव मतदाताओं को अपनी ओर मोड़ने की चुनौती है। परंपरागत वोटर-सवर्ण, बनिया और अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाता भाजपा के साथ दिख रहे हैं।
सपा : धर्मेंद्र यादव 
मूल रूप से सैफई के हैं और आजमगढ़ लोकसभा सीट पर दूसरी बार चुनाव मैदान में उतरे हैं। सपा के बिखरे मतदाताओं को एकजुट करना उनकी सबसे बड़ी चुनौती है। मुस्लिम-यादव वोटरों का सपा की ओर झुकाव इनका मजबूत पक्ष है। पांच विधानसभा क्षेत्रों में सपा का विधायक होना भी इनकी ताकत है।

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