छह जिलों को जोड़ने वाली वाराणसी-नेपाल फोरलेन सड़क का निर्माण फिलहाल अधर में लटक गया है। आजमगढ़ जिले के कप्तानगंज से लेकर वाराणसी तक नेशनल हाइवे अथारिटी को अभी तक जमीन उपलब्ध नहीं हो सकी। इस नाते 98.6 किमी तक सड़क चौड़ीकरण का काम शुरू नहीं हो सका। उधर, नेशनल हाइवे अथारिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) के अधिकारियों का कहना है राज्य सरकार जब तक 90 प्रतिशत जमीन अधिग्रहीत नहीं कराती है, तब तक वे फोरलेन का काम शुरू नहीं करा सकेंगे।
बताते चलें कि 2012 में यूपीए सरकार ने वाराणसी से नेपाल के लुंबनी तक नेशनल हाइवे बनाने की घोषणा की थी। प्रस्ताव के बाद सड़क चौड़ीकरण का सर्वे हुआ। बजट के चक्कर में अभी फाइल आगे बढ़ती, उसी समय चुनाव के बाद अधिसूचना जारी कर दी गई। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही वाराणसी-नेपाल सड़क मार्ग की फाइल फिर तेजी से आगे बढ़ी। वाराणसी से लेकर नेपाल तक 292 किलोमीटर तक फोरलेन सड़क निर्माण के लिए करीब 18 हजार करोड़ रुपये स्वीकृत कर दिया गया। नेशनल हाइवे अथारिटी आफ इंडिया (एनएचएआई) वाराणसी डिविजन ने निर्माण प्रक्रिया भी शुरू करा दी।
वाराणसी से जौनपुर, आजमगढ़, अंबेडकरनगर, बस्ती, टांडा और सिद्धार्थनगर से होकर गुजरने वाले फोरलेन के निर्माण को कुल पांच भागों में बांटा गया। इसके तहत एक टेंडर सिद्धार्थनगर जिले के नौगढ़ से बस्ती, बस्ती से टांडा, टांडा से कप्तानगंज, कप्तानगंज से लालगंज और लालगंज से वाराणसी के लिए है। धन मिलने के बाद एनएचएआई ने टेंडर प्रक्रिया शुरू करा दी। नौगढ़ से कप्तानगंज तक के लिए जमीन उपलब्ध हो गई। यहां काम भी शुरू हो गया। वहीं, आजमगढ़ से वाराणसी तक जमीन न मिलने से निर्माण की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी। चूंकि राज्य सरकार को सड़क निर्माण के लिए जमीन उपलब्ध कराना होता है। सर्वे के दौरान विरोध हुआ और किसानों ने जमीन देने से इंकार कर दिया। किसानों का तर्क है कि कप्तानगंज से वाराणसी के बीच मार्ग पर कई छोटी-बड़ी बाजारें स्थित हैं। फोरलेन बनने से बाजार उजड़ जाएगा।