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'एक बटा छब्बीस' से पूंजीवादी व्यवस्था पर चोट

Fri, 19 Feb 2016 11:28 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, आजमगढ़
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सूत्रधार संस्थान आजमगढ़ द्वारा संस्कृति विभाग के सहयोग से आयोजित 11वें आरंगम की नाट्य संस्था के दूसरे दिन तीन नाटकों की प्रस्तुति हुई। पहली प्रस्तुति भारतेंदु कश्यप की लिखित और निर्देशित नाटक 'एक बटा छब्बीस' थी। इस नाटक के माध्यम से पूंजीवादी व्यवस्था पर चोट की गई।
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इस नाटक की कहानी की पृष्ठभूमि एक बेकरी है, जिसके तलघर में छब्बीस काम करने वाले रहते हैं। जिनका जीवन तलघर में ही सिमटकर रह गया है। जहां न तो सूरज की किरण और न ही हवा का कोई झोंका पहुंच पाता है। बेकरी का मालिक निहायत ही निरंकुश और तंगदिल है।


इन काम करने वालों की जिंदगी में तान्या नामक लड़की आती है जो उसी इमारत में दर्जी का कार्य करती है। इनको तान्या अच्छी लगने लगी। तान्या ने भी इनसे दोस्ती कर ली और अपनी जरूरतों के साथ ही छोटी छोटी ख्वाहिशों को इनके सामने रखती है।
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सब तन, मन, धन से उन ख्वाहिशों को पूरा करने में लग जाते हैं लेकिन खुशी बहुत दिनों तक जारी नहीं रह सकी। तान्या को खोने की भावना छब्बीसों को खाने लगी। इस बीच तान्या चली जाती है। नाटक के माध्यम से पूूंजीवादी व्यवस्था पर कटाक्ष किया गया है। नाटक में अनुज निगम, अविनाश शर्मा, अमित कुमार सिंह, अरविंद नेगी, रोहित यादव, सूरज प्रताप सिंह, शुभम तिवारी, सचिन जायसवाल, विनय मिश्रा, हरिओम सोनी, चित्रांश राज तथा उमा सिंह आदि ने अभिनय किया।


नाट्य संध्या की दूसरी प्रस्तुति में 'नाचनी' का मंचन हुआ। इसका निर्देशन प्रियंका ठाकुर गर्ग और अभिषेक गर्ग ने किया। इस नाटक में एक स्त्री की कहानी है तो नाचनी बनती है। जो शहरों और कस्बों की आबादी से दूर जंगल में जी रही थी। एक दिन अचानक एक आदमी उसे प्राकृतिक संगीत के साथ ताल से ताल मिलाकर झूमते देख लेता है और उसे बलपूर्वक अपने साथ ले जाता है।


उसकी चीखें उस जंगल में मनुष्य के अलावा हर कोई सुनता है पर कोई उसे बचा नहीं पाता है और यहा से ंशुरू होती है उसकी असल यात्रा। अपनी इस यात्रा में वह मनुष्य होने को, औरत होने को, मां होने को और नृत्य को आत्मा की गहराइयों तक समझती है, आत्मसात करती है।


यह नाटक देश में महिलाओं की स्थिति का सटीक वर्णन करता है। नाटक में प्रियंका ठाकुर ने अपने भावपूर्ण अभिनय से सभी को प्रभावित किया। नाट्य संध्या की आखिरी प्रस्तुति व्योकेश शुक्ल के निर्देशन में 'राम की शक्ति पूजा' थी। इसमें दिखाया गया कि राम-रावण युद्ध चल रहा था।


युद्धरत राम निराश हैं और हार का अनुभव कर रहे हैं। शक्ति भी रावण के साथ हैं। देवी स्वयं रावण की ओर से लड़ रही हैं, राम ने उन्हें देख लिया है। बुजुर्ग जामवंत उनसे कहते हैं कि तुम सिद्ध होकर युद्ध में उतरो। राम ऐसा ही करते हैं। उधर लक्ष्मण, हनुमान आदि के नेतृत्व में घनघोर संग्राम जारी रखते हैं।


इधर राम की साधना चल रही है। उन्होंने देवी को 108 नीलकमल अर्पित करने का संकल्प लिया था, लेकिन देवी चुपके से आकर आखिरी पुष्प चुरा ले जाती हैं। राम विचलित और स्तब्ध हैं। तभी उन्हें याद आता है कि उनकी आंखों को मां नील कमल कहा करती थीं। वह नेत्र अर्पित कर डालने के लिए हाथों में तीर उठा लेते हैं, तभी देवी प्रकट होती है।


वह राम को रोकती हैं, उन्हें आशीर्वाद देती हैं और राम में अंतर्ध्यान हो जाती हैं। इसके पहले नाट्य संध्या के दूसरे दिन का शुभारंभ डा. अनूप सिंह यादव और अभिषेक जायसवाल ने दीप प्रज्जवलित कर किया। इस मौके पर संस्था के अध्यक्ष डा. सीके त्यागी, संरक्षक फौजदार सिंह, इंद्रासन राय, सुदर्शन दास अग्रवाल, डा. अमित सिंह, डा. स्वास्ति सिंह, डा. एके सिंह आदि उपस्थित थे। 
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