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शिक्षा मानव विवेक को जागृत करने का भी माध्यम : बाबा सिद्धार्थ गौतम

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महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय में आयोजित संगोष्ठी को संबो​धित करते बाबा सिद्धार्थ गौतम - फोटो : अमर उजाला
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आजमगढ़। शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि मानव विवेक को जागृत कर नैतिकता, परस्पर प्रेम और मानव कल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग है। ये बातें क्रीं कुंड, वाराणसी के पीठाधीश्वर अघोराचार्य बाबा सिद्धार्थ गौतम रामजी ने कही। वे शनिवार की देर शाम महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय परिसर में “अघोरदर्शन: शिक्षा में समरसता और मानवीय मूल्यों की स्थापना” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में शामिल हुए थे। उन्होंने ऐसे आयोजनों को अन्य विश्वविद्यालयों में भी नियमित रूप से आयोजित किए जाने की आवश्यकता बताई।
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आयोजन अघोरपीठ वाराणसी के सहयोग से और कुलपति प्रो. संजीव कुमार के निर्देशन में हुआ। कुलपति ने कहा कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में संतों की वाणी और भारतीय मनीषा में निहित अघोरदर्शन के नैतिक सिद्धांतों को शामिल किया जाए तो एक सभ्य, सुरक्षित और नैतिक समाज का निर्माण संभव है।
क्रीड़ा सचिव प्रो. प्रशांत कुमार राय ने कहा कि अघोर का अर्थ सहज और सरल होना है। इसी भावना के साथ समाज और राष्ट्र के विकास के लिए अघोरदर्शन के मूल्यों को शिक्षा से जोड़ना आवश्यक है।
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संगोष्ठी में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से आए डॉ. विकास सिंह ने अघोर परंपरा के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए सामाजिक समरसता के लिए इसके महत्व को रेखांकित किया।
वहीं छत्तीसगढ़ के राजकीय महाविद्यालय कोरिया के डॉ. विनय कुमार शुक्ल ने शिक्षा केंद्रों में अघोर परंपरा पर शोध की आवश्यकता बताई। गोरखपुर से आए चिकित्सक डॉ. रूप कुमार बनर्जी ने सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन के लिए अघोर के सिद्धांतों को अपनाने पर जोर दिया।बृजभान सिंह, डॉ. मनमोहन लाल सहित कई वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कुलसचिव डॉ. अंजनी मिश्रा ने आभार जताया। संचालन डॉ. दीपिका अग्रवाल और डॉ. पंकज सिंह ने संयुक्त रूप से किया।
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