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जोखिम भरा सफर: सात गांवों की लगभग 5000 की आबादी 'चह' से करती है आवागमन, गिरकर चोटिल होते हैं लोग

Sat, 04 Jul 2026 05:40 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, आजमगढ़।

सार

आजमगढ़ में दाउदपुर-ककरहटा कोलघाट पर तमसा नदी पर स्थायी पुल न होने से सात गांवों की लगभग 5000 की आबादी 'चह' से आवागमन करती है। जिससे आए दिन चह से गिरकर चोटिल लोग होते हैं। 
 
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बांस- बल्ली से बना पुल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दाउदपुर-ककरहटा कोलघाट पर तमसा नदी पर स्थायी पुल न होने से लगभग 5000 लोग जोखिम भरा सफर करने को मजबूर हैं। लोग बांस-बल्ली से बने एक अस्थायी पुल 'चह' का उपयोग कर रहे हैं, जो आजमगढ़ सदर और मुबारकपुर विधानसभा क्षेत्रों को जोड़ता है। इस पुल के अभाव में हर दिन यात्री, जिनमें महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग शामिल हैं, अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार करते हैं। बाढ़ आने पर यह अस्थायी पुल बह जाता है, जिससे आवागमन पूरी तरह ठप हो जाता है।

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तमसा नदी के एक ओर पल्हनी विकास खंड और दूसरी ओर सठियांव विकास खंड पड़ता है। पल्हनी विकास खंड के चिंवटहीं, सलारपुर, दाउदपुर, भीतरी मंझरिया और सठियांव विकास खंड के ककरहटा कोल घाट, मनचोभा, उकरौड़ा जैसे आजमगढ़ सदर के गांव इस समस्या से प्रभावित हैं। 

सुबह से रात तक लगभग 5000 लोग इस रास्ते से आजमगढ़ शहर और मुबारकपुर आते-जाते हैं। सबसे गंभीर स्थिति तब पैदा होती है जब किसी बीमार व्यक्ति को तत्काल इलाज की जरूरत होती है। समय पर इलाज न मिलने के कारण कई बार मरीजों की मौत हो जाती है। यह पुल हर बरसात में बह जाता है। इसके बाद फिर इन गांवों के लोग डेढ़ से दो लाख रुपये खर्च कर इसका निर्माण करते हैं।

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बोले लोग
पुल से जाने के लिए 50 से 60 रुपये देने पड़ते हैं। पुल का निर्माण होता तो सुविधा होती और आपातकाल में महिला मरीज को घुमाकर ले जाने में समय अधिक लगता है, ऐसे में दवा के अभाव में मौत हो जाना आम बात है। यह अस्थायी व्यवस्था लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
-अर्पित सिंह 

रात में इस चह से यात्रा करने में डर लगता है। रात के समय किसी हादसे की जानकारी भी नहीं मिल पाती। लेकिन, घर पहुंचना है तो यह शार्टकट रास्ता होने के कारण इसका उपयोग करना मजबूरी होती है।
-विजय कुमार

इस ''चह'' से गुजरते समय लोग अक्सर गिरकर चोटिल हो जाते हैं। यहां देखरेख करने वाले लोग हालांकि सहायता करते हैं, लेकिन यह समाधान नहीं है। यह स्थिति यात्रियों के लिए लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। -प्रशांत भारती। 

पुल के निर्माण से बहुत आसानी होती। इस समस्या को लेकर कई बार धरना प्रदर्शन भी किए गए हैं। लेकिन हमारी मांग पर कोई सुनवाई नहीं हुई।
-समावती देवी
 
बोले संचालक
इसे बनाने में डेढ़ से दो लाख रुपये खर्च होते हैं। हम बांस-बल्ली से जोड़कर इसे जनसेवा की भावना से बनाते हैं और किसी को परेशान नहीं करते हैं। हालांकि, यात्रियों को हर बार नदी पार करने के लिए 50 से 60 रुपये का शुल्क देना पड़ता है। यह शुल्क कई बार लोगों के लिए एक अतिरिक्त बोझ बन जाता है। बाढ़ के बाद इसे दोबारा बनाने में भी काफी खर्च आता है। इसलिए लेना पड़ता है। -विजय साहनी, चह संचालक 
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