आजमगढ़। छह साल से कम उम्र के बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा और पोषण मुहैया कराने के उद्देश्य से चल रहे आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति जिले में बेहद चिंताजनक है। सरकारी दावों के उलट जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। हमारी टीम की पड़ताल में सामने आया कि कई केंद्रों पर ताले लटक रहे हैं, जबकि कुछ जगहों पर एक भी बच्चा नहीं पहुंचा।
जिले में 5588 आंगनबाड़ी केंद्र हैं। इनमें से 710 ऐसे आंगनबाड़ी केंद्र हैं जो खुद के भवन में संचालित हो रहे हैं।
बाकी के 4878 आंगनबाड़ी केंद्र प्राइमरी व पंचायत एवं सामुदायिक भवन में संचालित हो रहे हैं। इन आंगनबाड़ी केंद्रों में करीब 4926 आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व 4158 सहायक नियुक्त हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन बच्चों का नामांकन इन केंद्रों में किया गया है, उनकी उपस्थिति नाम मात्र की है।
शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक अधिकांश केंद्रों की स्थिति एक जैसी है। जिम्मेदारों की लापरवाही और निगरानी की कमी के चलते न तो समय पर केंद्र खुलते हैं और न ही बच्चों को लाभ मिल पाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन केंद्रों की नियमित जांच और सख्त निगरानी हो तो सुधार संभव है। फिलहाल तो इन केंद्रों की हालत सरकारी उपेक्षा की कहानी बयां कर रही है।
केंद्रों पर नहीं मिला एक भी बच्चा
मकान में संचालित केंद्र : फरिहा के पश्चिम बस्ती में रामलीला थर्ड के मकान में चल रहे केंद्र में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रामलीला उपस्थित थीं, लेकिन सहायिका विद्या देवी मौके पर नहीं थीं। केंद्र पर 22 में से एक भी बच्चा मौजूद नहीं मिला। वहीं संतोषी देवी के आवास पर संचालित केंद्र में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता मौजूद मिलीं लेकिन सहायिका शांति देवी अनुपस्थित। नामांकित 28 बच्चों में से कोई भी केंद्र पर नहीं मिला।
इन दो केंद्रों पर नहीं मिला कोई
दक्षिण बस्ती के सामुदायिक हॉल में केंद्र का संचालन होता है। यहां कार्यकर्ता उर्मिला देवी और सहायिका बासमती देवी के नाम तो दीवार पर अंकित थे, लेकिन केंद्र पूरी तरह खाली मिला। ग्रामीणों ने बताया कि स्टाफ कभी-कभार ही आता है। कंपोजिट विद्यालय फरिहा परिसर के केंद्र पर ताला लटका मिला। कार्यकर्ता सीमा और सहायिका मीरा दोनों अनुपस्थित थीं।
पूरवा मोहल्ला में संचालित केंद्र मिला बंद
यहां संतोषी देवी और सहायिका शांति देवी कार्यरत हैं, पड़ताल के समय केंद्र बंद मिला। कुछ कार्यकत्रियों ने बताया कि वे ई-केवाईसी और फेस कैप्चर कार्य में व्यस्त थीं, लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि सहायिकाओं की उपस्थिति अनिवार्य होनी चाहिए।
बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए सभी को निर्देश दिया गया है। यदि नामांकन अधिक है और उपस्थिति की संख्या कम पाई जाती है तो जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।- हेमंत सिंह, डीपीओ आजमगढ़।