आजमगढ़। निकाय चुनाव परिणाम आने के बाद शनिवार को हुए मंथन से जहां यह पूरी तरह से स्पष्ट हो गया कि नगर पंचायत लालगंज में भितरघात से सपा की साइकल पंक्चर हो गई। पूर्व कैबिनेट मंत्री बलराम यादव को छोड़ पार्टी का कोई भी नेता अपने क्षेत्र में पार्टी को सफलता नहीं दिला सका। बल्कि जिन क्षेत्र में पार्टी के किसी दिग्गज ने अपनी प्रतिष्ठा दांव पर नहीं लगाया था वहां के प्रत्याशी ने जीत हासिल की।
नगर पालिका परिषद आजमगढ़ में सपा के पुराने कार्यकर्ता और पूर्व कैबिनेट मंत्री दुर्गा प्रसाद यादव के करीबी पद्माकर लाल वर्मा पर पार्टी ने दांव आजमाया था। दुर्गा प्रसाद ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। लेकिन वोटरों ने निर्दल को चुना। इसी तरह से पार्टी ने लालगंज में महेश सोनकर पर दांव खेला। महेश की जीत के लिए पूर्व विधायक बेचई सरोज ने दिन रात एक कर दिया। लेकिन लालगंज में भितरघात और अंदरूनी कलह से साइकल पंक्चर हो गई। पार्टी ने निजामाबाद में अपने पुराने साथी पर भरोसा न करके दूसरे को टिकट दे दिया। परिणामस्वरूप वहां निर्दल प्रत्याशी जीत गया। नवगठित माहुल नगर पंचायत में जीत के लिए पूर्व विधायक श्याम बहादुर यादव एड़ीचोटी का जोर लगा दिया। बावजूद इसके वोटरों का भरोसा नहीं जीत पाए। यहां पार्टी प्रत्याशी पांचवें स्थान पर रहा। सपा का सबसे खराब प्रदर्शन सरायमीर में छठवें स्थान पर रहा। अतरौलिया में पूर्व कैबिनेट मंत्री बलराम यादव और उनके बेटे विधायक डा. संग्राम यादव की मेहनत के चलते सीट निकली। सबसे मजेदार बात तो यह रही कि मुबारकपुर नगरपालिका में प्रत्याशी की मदद में कोई बड़ा शीर्ष नेता नहीं मैदान में उतरा। फिर भी यहां बसपा से गद्दी छीनकर सपा ने अपने कब्जे में कर ली। वहीं महराजगंज नगर पंचायत में हुई सपा की जीत का पूरा श्रेय पार्टी नेताओं को नहीं बल्कि सपा प्रत्याशी रेनू देवी और उनके परिवारवालों को जाता है। निकाय चुनाव परिणाम के संबंध में सपा जिलाध्यक्ष हवलदार यादव ने कहा कि सभी दलों से हमारा बेहतर प्रदर्शन रहा है। जहां खामियां उजागर हुई हैं। उस पर विचार विमर्श कर दूर कर लिया जाएगा।
मुस्लिम वोटों का नहीं मिला साथ
आजमगढ़। सपा को अपने परंपरागत वोट बैंक मुस्लिमों पर भरोसा था। इसी रणनीति से व्यापारी नेता पद्माकर को प्रत्याशी बनाया गया था। योजना वैश्य और मुस्लिमों का गठजोड़ बनाने की थी। लेकिन मुस्लिमों ने विधानसभा चुनाव से सबक लेकर इस बार भाजपा को हराने वाले प्रत्याशी को ही वोट करने की ठान ली थी। इसलिए सभी निकायों में उन्होंने अंत तक इंतजार किया और पार्टी को नहीं उस प्रत्याशी को वोट किया जो जीतने की स्थिति में था। शीला श्रीवास्तव भी मुस्लिमों का वोट अपनी ओर खींचने में सफल रहीं।