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विभा और ममता ने रचा सफलता का सोपान

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आजमगढ़। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का आयोजन हर वर्ष होता है। जिसका उद्देश्य ऐसी महिलाओं को प्रेरित करना है जिन्होंने समाज में अच्छा कार्य किया है और जो कड़े संघर्षों के बाद समाज अपनी एक अलग पहचान बनाई हैं। जिले में वैसे तो कई नाम हैं जिन्हें इन संघषो़ं की श्रेणी में रखा जा सकता है। लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने अपने अदम्य साहस से एक नया मुकाम हासिल कर समाज में एक मिसाल पेश हैं।
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नगर के सब्जी चौराहा स्थित न्यू कला केंद्र की संस्थापिका विभा गोयल को इसमें सबसे ऊपर रखा जा सकता है। विभा गोयल ने आंख से अंधी होते हुए समाज अपना एक अलग स्थान बनाया है। आंख से अंधी होने के बाद भी विभा गोयल ने कभी भी अपनी इस कमजोरी को आड़े नहीं आने दिया। आज बड़ी कुशलता से अच्छे से अच्छे डिजाइन बना लेती है। क्राफ्ट के सामानों को तैयार करने में कोई उनका हाथ नहीं पकड़ सकता है। अपनी इस कला के दम पर उन्होंने अपने परिवार को संभाला। कला केंद्र के आफिस में प्रतिदिन ढ़ोलक, डांस, कपड़े की सिलाई, कढ़ाई और बुनाई सीखने के लिए दर्जनों महिलाएं और बच्चे आते हैं। जिसके माध्यम से वह महिलाओं को आत्म निर्भर बनाने का कार्य भी करती है।
नगर के रैदोपुर निवासिनी रंगकर्मी ममता पंडित को दूसरे स्थान पर रखा जा सकता है। ममता ने सामाजिक रूढ़िवादिता से ऊपर उठकर ऐसे क्षेत्र में कैरियर बनाने की सोची जिसमें बड़े घर के लोग कदम रखने से डरते हैं। लेकिन ममता के इस कार्य में उनके पति अभिषेक पंडित ने भी उनका पूरा साथ दिया। आज ममता का नाम दिग्गज रंगकर्मियों में लिया जाता है। ममता पंडित को शुरू से ही गाने और डांस का बहुत शौक था। उनके पतिअभिषेक शुरू से थिएटर से जुड़े थे और निरंतर नाटकों में कुछ न कुछ काम कर रहे थे। परिवार को अभिषेक का ही रंगमंच से जुड़ाव नागवार था ऐसे में ममता का रंगमंच से जुड़ना संभव नहीं थी। छोटी जगहों पर महिला एक्टर मिलना काफी मुश्किल था। आगरा में थिएटर वर्कशाप के दौरान यह समस्या अभिषेक ने नादिरा बब्बर के सामने रखी। इस पर नादिरा जी ने कहा कि जब तक आप अपने घरों की औरतों, बेटियों को आदरपूर्वक रंगमंच पर नहीं लाएंगे तब तक आम आदमी क्यों लाएगा। आगरा से लौटते ही अभिषेक ने मुझसे पूछा रंगमंच से जुडना है। विरोध के बाद भी कदम आगे बढ़ते गए और आज वह जनपद की जानीमानी रंगकर्मी हैं। इनके द्वारा सूत्रधार संस्थान की स्थापना कर नए कलाकारों को तराशने का कार्य किया जाता है।
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मऊ जनपद के मऊ नाथ भंजन में जन्मी अंशुमाला सिंह कालेज के दिनों से सामाजिक कार्यों से जुड़ी थी। कालेज में पढ़ाई के दौरान बनारस में रहते हुए गरीब बस्तियों में दोस्तों के निकल जाती थी। जहां वह उन बस्तियों के बच्चों को इकठ्ठा कर उन्हें पढ़ाती थीं। वह लोगों की यथा संभव मदद भी करती थी। महिला शिक्षा में एमफिल और एलएलबी करने के बाद वह आली नाम की संस्था के साथ जुड़कर मुस्लिम और दलित वर्ग की महिलाओं के नागरिक अधिकारों और घरेलू हिंसा पर काम करती हैं। पूछे जाने पर हंसते हुए कहती हैं कि कठिनाइयों का मत पूछिए, अंदर बहुत अंधेरा है।एक तरफ घर की सरहदें दूसरी तरफ समाज की सीमा,चारों तरफ पितृसत्ता का घेरा है। औरतें न तो अपनी पसंद से पहन सकती हैं न शिक्षा ग्रहण कर सकती हैं। न शादी कर सकती हैं और ना ही नौकरी। सबका निर्णय मर्दों के हाथ में है। ऐसे में उन्हें अपने हक के लिए लडने के लिए प्रेरित करना बहुत मुश्किल है, पर हम कर रहे हैं।
रामानंद सरस्वती पुस्तकालय जोकहरा आज हिन्दी साहित्य के परिदृश्य में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। प्रतिवर्ष आजमगढ़ के सबसे पिछड़े क्षेत्र जोकहरा में देश भर से साहित्यकार आयोजनों में सहभागिता करने आते हैं। खेतों के बीच गांव में बने इस पुस्तकालय की स्थापना साहित्यकार बीएन राय ने अपने माता-पिता की स्मृति में की थी। जिसे आज बड़ी कुशलता से वहां की निदेशिका हिना देसाई संचालित कर रही हैं। पुस्तकालय विजया नाम से महिलाओं का एक स्वयं सेवी संगठन भी संचालित करता है, जिसका उद्देश्य महिलाओं को स्वावलंबी बनाना एवं घरेलू हिंसा से बचाना है। हिना के इस मिशन से लगभग दो हजार औरतें जुड़ी हैं। हमारा जो सामाजिकरण है वह कहीं ना कहीं हमारी क्षमताओं पर, हमारी उड़ान पर पहरा और बंदिश लगाने की कोशिश करता रहता है। औरत को एक इंसान न समझ कर एक वस्तु के रूप में ही देखता है। लेकिन हिना देसाई ने इन सारी बंदिशों को तोड़ते हुए उड़ान भरी है। विभूति नारायण राय और पति दर्शन देसाई की प्रेरणा से गुजरात में जनरल ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की सेक्रेटरी के पद छोड़कर उन्होंने समाज सेवा के इस रास्ते को चुना।
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