सगड़ी। तहसील क्षेत्र के डोरवा चौहान बस्ती में हिंदू लोगों की ओर से 350 वर्षों से निकाला जा रहा ताजिए का जुलूस इस बार कोविड-19 के कारण नहीं निकलेगा। इसको लेकर लोग मायूस हैं। जुलूस न निकलने के कारण सुंदरसराय बल्लो और डोरवा गांव के ताजिया का मिलन भी इस बार नहीं होगा।
डोरवा गांव के चौहान बस्ती के सौ से अधिक घरों के लोग 350 से अधिक वर्षों से अपने हाथ से ताजिया बनाते हैं। जुलूस भी निकालते हैं। यहां की ताजिया पूरे पूर्वांचल में मशहूर है। ताजिया बनाने के लिए यहां की सोने की झूमर और चांदी की कलशी सिंगापुर से मंगाई गई थी। इसका प्रयोग ताजिया बनाने में प्रयोग किया जाता है। आज भी मौजूद है। यहां के ताजिया देखने के लिए दूरदराज से लोग आते हैं। गांव में उत्सव सा माहौल रहता है। जो कहीं बाहर रहकर नौकरी करते हैं मोहर्रम में घर चले आते हैं। घर की लिपाई-पुताई कर मलीदा बनाया जाता है। इसे प्रसाद के रूप में वितरण किया जाता है। गुलाब चौहान ने बताया कि ताजिया न बनने से हम लोग मायूस है। इसकी तैयारी चल रही थी, लेकिन कोविड -19 के चलते रोक लगा दी गई है। गाइडलाइन का पालन किया जाएगा। मुन्नीलाल चौहान ने बताया कि 350 वर्ष में यह पहली बार है कि गांव के लोगों की ओर से ताजिया नहीं बनाया जा रहा है। इसके चलते हम लोग बहुत दुखी है। प्रमोद चौहान ने बताया कि प्रशासन को चाहिए था कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए ताजिया बनाने देना चाहिए था। चौक पर रखकर लोग रस्में पूरा कर लेते।
स्थगित हुआ 10वीं और 14वीं मोहर्रम का जुलूस
मेजवां। फूलपुर स्थिति चमावां गांव में अंजुमन फरोगे अजा की बैठक जफर अब्बास की अध्यक्षता में हुई। इसमें कोरोना के मद्देनजर 10 मोहर्रम को जफर अब्बास के अजाख़ने से निकलने वाला कदीम जुलूस न निकालने का निर्णय लिया गया। साथ ही 14 मुहर्रम के जुलूस को भी स्थगित कर दिया गया है। सचिव राजीउल हसन ने कहा कि मोहर्रम संबंधित सभी कार्य सरकार की गाइड लाइन के अनुसार करने का फैसला लिया गया है। उधर, कैफी आजमी के गांव मेजवा में भी बैठक कर जुलूस न निकलने का निर्णय लिया गया। इस मैके पर सैयद जफर अब्बास, रज्जन प्रधान, रिजवान, मीसम, आर हुसैन, सखावत, नैय्यर, नदीम, अफसर, लड्डन, दुलारे, अकील, लाडले थे।
इतिहास के पन्नों में हजरत इमाम हुसैन का हर अमल दर्ज
सरायमीर। कस्बा और ग्रामीण क्षेत्रों के इमामबाड़ों में शहीदाने करबला की याद में मजालिस का दौर जारी है। नौवीं मोहर्रम को कस्बा के विभिन्न इमामबाड़ोंअजाखाना अबू तालिब, जव्वाद मंजिल, बारगाहे हुसैनी और अजाखाना जहरा मेंमजलिस का आयोजन किया गया। खिताब करते हुए इमामे जुमा मौलाना मासूम असगर ने कहा कि मदीने से करबला तक के सफ़र में हजरत इमाम हुसैन (अ.स.) ने अमन और शान्ति का सन्देश दिया। उन्होंने यही बताया कि जंग की पहल नहीं करनी चाहिए। जंग टालने की कोशिश करना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि अगर पवित्र धार्मिक स्थलों में झगड़ा,फ़साद व खून बहने का अन्देशा हो तो उस जगह को छोड़ देना चाहिए। इमाम हुसैन ने कभी यह नहीं कहा कि हक़ और सच्चाई के रास्ते से हट जाना चाहिए। उन्होंने यह संदेश दिया है कि भले ही सर कट जाए, जालिम का समर्थन नहीं करना चाहिए। इतिहास के पन्नों में हजरत इमाम हुसैन का हर अमल दर्ज है।