आजमगढ़। मौलाना मोहम्मद शाबिर अहमद ने बताया कि हदीस पाक में आया है कि मुकद्दस रमजान में मौत, हयात और सेहत के फैसले होते है। उन्होंने बताया कि हुजूर साहब ने इस माह की अजमत का बयान अपने सहाबा से फरमाया और इबादत दुआओं का एहतमाम किया। इस्लामी महीनों में चंद महीने खासतौर से मोहतरम और मुकद्दस माने जाते है। जिसमें शाबान, रमजान, शौउवाल, जिलकायदा, जिलहिजा और मुहर्रम होता है। शाबान का महीना रमजान से ठीक पहले का महीना है। हुजूर सल्लाहो सल्लम ने इस महीने में रोजा रखने का एहतमाम फरमाया है। रमाजन के फर्ज रोजों के बाद हुजूर ने सबसे ज्यादा नफिल रोजे रखने का एहतमाम इसी महीने में किया है। उन्होंने कहा कि आप का रोजा रखना तभी कामयाब होगा जब आप अपने आंख, नाक, कान, जुबान, मन को अपने बस में रखे अर्थात आप अपने नब्स को (इंद्रियों) को नियंत्रित रखे। इस्लाम में नब्स को नियंत्रित करने के लिए पांच वख्त की नमाज पढ़ने के लिए कहा गया है। इससे आप का नब्स अपने काबू में रहता है। उन्होंने बताया कि रोजा रखने से दिल के खोट दूर हो जाते है।
रमजान के पहला असरा रहमत का
अमिलो। माहे रमजान के आगाज के साथ ही मस्जिद नमाजियों से भरी नजर आने लगी है। रोजेदार इबादत कर अमन-ए-सलामत और चैन के लिए अल्लाह से दुआ मांग रहे हैं। मुबारकपुर नगर सहित आसपास के क्षेत्रों की मस्जिदों में नमाज अदा करने के साथ तिलावत-ए-कुरान पाक में लोग तल्लीन नजर आ रहे है।
रमजान माह का पहला असरा रहमत का होता है। पूरा महीना तीन असरे में बंटा होता है। शुरू के दस रोजों में नेक रोजेदार बन्दों पर अल्लाह त आला रहमत की बारिश करता है। हर मुसलमान रोजेदार अपने ईमान और अकीदे के साथ फज्र से लेकर मगरिब तक रोजा रखता है। भोर में सहरी का समय 3.39 बजे के बाद से सूर्यास्त तक 6.41 बजे तक कुल 15 घंटे का रोजा रखना होता है। इसके बाद रोजा इफ्तार करना नसीब होता है। रात में तरावीह की नमाज, नफिल नमाज लोग कसरत से पढ़ते हैं। इस बाबरकत और रहमत के महीने में नफिल का सवाब बढ़ाकर फर्ज नमाज के बराबर और फर्ज नमाज का सवाब 70 फर्ज के बराबर कर दिया जाता है। इसलिए लोग रमजान के महीने में कसरत से इबादत करते हैं। ताकि उनकी दुनियावी आखिरत की दोनों जिन्दगी संवर जाए।