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नामवर सिंह ने साहित्यिक विचारों के बदले तेवर

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आजमगढ़। लोक मनीषा परिषद की ओर से हरिवंशपुर स्थित कार्यालय में हिंदी आत्मचेतना को धार देने वाले साहित्यिक विधा के नवयुग प्रवर्तक प्रो. नामवर सिंह के निधन पर शोकसभा आयोजित की गई। इसकी अध्यक्षता डा. शिवाजी गोंड और संचालन हरिसेवक मौर्य ने किया। साहित्यिक प्रेमियों ने उनके चित्र पर श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा की।
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डा. शिवाजी गोंड ने कहा कि साठोत्तरी कविता-साहित्य के युग नायक प्रो. नामवर सिंह ने समाज के भीतर रचित पूर्ववर्ती साहित्यिक विचारों, विधाओं से उदासीन होते हिंदी के प्रबुद्ध चिंतकों को बदलते समाज के अनुकूल नए तेवर प्रदान करने का अद्वितीय कार्य किया। साहित्य में 50 और 60 के दशकों में उभर चुकी नई वैचारिक कविताओं को ’कविता के नए प्रतिमान‘ सृजत कर इसे शास्त्रीय रूप प्रदान किया। कौशल कुमार शुक्ल ने उन्हें सजगता का प्रखर वक्ता तथा साहित्यिक और समाज के बीच विचार की जटिलता परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर सेतु बनकर अभिव्यक्ति को नया आयाम देने वाला बताया। अध्यक्ष पंडित जनमेजय पाठक ने कहा कि प्रो. नामवर सिंह अपने चिंतन में समसामयिक जीवन विकास के लिए समस्त साहित्य के अनुभव खंडों से आगे बढ़कर जीवित व्यक्ति के गुणात्मक अभिव्यक्ति को दर्शाने का मार्ग प्रशस्त किया। डा. अखिलेश चंद्र ने कहा कि चंदौली के जीयनपुर में जन्म लिए प्रो. नामवर सिंह ने उदय प्रताप कालेज वाराणसी और काशी हिंदू विवि के छात्र रहकर वहीं पर अध्यापन कार्य किए। डा. गीता सिंह ने नामवर को आलोचना क्षेत्र का दक्ष मर्मज्ञ बताया। प्रमोद कुमार, सूर्यनाथ, रविराय, विमल श्रीवास्तव, विष्णुशरण, अम्ब्रीश त्रिपाठी, विजयदेव सिंह सहित आदि मौजूद रहे।
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