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गर्मी और डर के कारण सलोना और जमुआवा से दूर विदेशी मेहमान

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आजमगढ़। साइबेरिया समेत अन्य देशों से प्रजनन और प्रवास के लिए ठंड के समय में जिले के सलोना और जमुआवा ताल आने वाले विदेशी मेहमान अभी तक दूर हैं। दशहरे के बाद से ही विदेशी पक्षियों से रौनकदार रहने वाले ताल अभी तक सूने हैं। गर्म मौसम और शिकारियों के डर को इसकी वजह बताई जा रही है। वन विभाग के अनुसार मौसम ठंडा होने पर पक्षियों के आने की उम्मीद है।
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अजमतगढ़ ब्लॉक के सलोना ताल का क्षेत्रफल लगभग 107 हेक्टेयर है। ये उत्तर में अजमतगढ़ कस्बा, दक्षिण में बरडीहा गांव, पूर्व में नरहन भरौली गांव और पश्चिम में आजमगढ़-दोहरीघाट राज्यमार्ग तक फैला है। दशहरे के बाद से यहां साइबेरियन, लालसर, वार हेडेड गूज, शावलर, पेलिकन, टिका, बगुला, सारस आदि पक्षियां यहां आकर घरौंदा बनाने लगते हैं। यहीं आकर ये पक्षी अंडा देते हैं और फरवरी-मार्च माह में बच्चों के साथ लौटते हैं। वहीं ठेकमा ब्लाक जमुआवा ताल का क्षेत्रफल 989 बीघा है। इसके पश्चिम में ईरनी गांव है। यहां भी दशहरा के बाद विदेशी पक्षियों का आगमन शुरू हो जाता था। अक्तूबर का दूसरा सप्ताह शुरू हो चुका है, लेकिन पक्षी का ये घराना अभी तक वीरान है। प्रवासी पक्षियों से गुलजार रहने वाले इस ताल में अभी तक सिर्फ स्थानीय पक्षी ही नजर आ रहे हैं। वन विभाग की माने तो इस बार दशहरे के बाद तापमान सामान्य से तीन से पांच डिग्री तक अधिक है। तापमान में कोई कमी नहीं हो रही है। प्रवासी पक्षी ठंडे मौसम में ही इधर का रुख करते हैं। अभी दिन का तापमान 35 और रात का 25 डिग्री सेल्सियस के आसपास रह रहा है। दिन का तापमान 30 और रात का 20 से नीचे होने पर ही विदेशी मेहमान इधर का रुख करेंगे।

कहीं शिकारियों का डर तो नहीं
आजमगढ़। ठंड के मौसम में जिले के तालों में अपना बसेरा बनान वाले पक्षियों के शिकार पर प्रतिबंध तो है, लेकिन इनकी सुरक्षा के लिए ठोस प्रबंध नहीं होते हैं। शिकारी मेहमान पक्षियों का शिकार एयरगन, जाल, फंदा और नशीली दवा डालकर करते हैं। क्योंकि क्षेत्र में इनके मांस की खूब मांग होती है। शौकीन लौग मनमाफिक पैसा देकर इसकी खरीदारी करते हैं। शिकार में वन विभाग के कर्मचारियों की भी मिलीभगत होती है। पिछले वर्ष भी प्रवासी पक्षियों की आवक जिले में काफी कम हुई थी। स्थानीय लोगों की मानें तो शिकार के कारण भी लगातार पक्षियों की आवक कम हो रही है।
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तो सूना रह जाएगा ये घरौंदा
वन विभाग के अधिकारियों की ओर से विदेशी मेहमानों के स्वागत के कोई प्रबंध नहीं होने से भी इनकी आवक संख्या प्रभावित हो रही है। पूरे ताल में झाड़-झंखाड़ भरी पड़ी है। पानी भी काफी कम है। ताल सलोना पूरी तरह से तिन्नी, जइता, जलकुम्भी आदि से ढका पड़ा है। विभाग की ओर से यहां न टापू बनाने का प्रबंध है और न सफाई का।

खूब होता है कमलगट्टा
जमुआवा ताल में कमल का फूल और कमलगट्टा खूब होता है। इसकी जड़ सब्जी के काम में आती है। मछली भी काफी होती है। इससे ग्रामसभा का राजस्व बढ़ता है। प्रत्येक साल इसे नीलाम किया जाता है। गांव के पुराने लोगों का कहना है कि इसे रानी पद्मावती ने बनवाया था, लेकिन कोई प्रमाण नहीं मिलता है। प्रधान संध्या सिंह ने बताया कि ताल से काफी लाभ होता है।

पक्षी विहार का था प्रस्ताव
2004-05 में तत्कालीन पर्यावरण मंत्री की ओर से सलोना ताल को पक्षी विहार बनाने का प्रस्ताव दिया गया था। 107 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला ताल की सुधि पर्यावरण मंत्री स्व. रामप्यारे सिंह ने ली थी। सर्वे का कार्य हुआ, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद पक्षी विहार अधर में रह गया। 2008 में प्रभागीय निदेशक पीएस दुबे ने फिर प्रस्ताव बनवाया, लेकिन ये भी अटका हुआ है। ताल पर अतिक्रमण जारी है। पक्षियों के संबंध में जब क्षेत्राधिकारी जीयनपुर रामजीत राम से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि जल्द ही रेंज का चार्ज मिला है जानकारी नहीं है। ताल सलोना में नलकूप भी लगा है। पहले मंझरिया, सिकंदरपुर, भटौली, बनोरा, नरयना, मेघयी, ढ़ेलुआ, नरहन, सालेपुर, बसंतपुर आदि गांवों के सिंचाई इसी नलकूप से होती थी। आज सिर्फ ढेलुआ बसंतपुर तक ही सिंचाई होती है।

मौसम गरम होना और शिकार का डर प्रवासी पक्षियों के न आने का कारण हो सकता है। ठंड के मौसम में इनके आने की उम्मीद है। पिछली बार भी काफी कम पक्षी आए थे। इनकी सुरक्षा के प्रबंध किए जाएंगे।
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एसएन मिश्रा, डीएफओ
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