अयोध्या। राम की नगरी अयोध्या में जहां एक ओर वैदिक परंपराएं गूंजती हैं, वहीं दूसरी ओर तीर्थंकर ऋषभदेव की तपो परंपरा भी उसी आस्था के साथ रची-बसी है। इसी पावन धरा पर स्थिति दिगंबर जैन मंदिर रायगंज में रविवार को भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा स्थापना की 60वीं वर्षगांठ अत्यंत श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाई गई।
जैन धर्म की सर्वाेच्च साध्वी ज्ञानमती के पावन सानिध्य में प्रात:काल वैदिक-जैन मंत्रों के गूंजते स्वर के बीच भगवान ऋषभदेव की 31 फीट ऊंची उत्तुंग प्रतिमा का अभिषेक किया गया। 51 लीटर दूध से भगवान ऋषभदेव का अभिषेक किया गया। इसके अलावा शांतिधारा कर प्रभु से विश्व शांति और जीवन की शुभता की कामना की गई।
अभिषेक की प्रत्येक धारा में तप, त्याग और संयम की आभा समाई हुई थी। मुख्य आकर्षण 108 भव्य थालों से किया गया अष्टद्रव्य विधान था। इन थालों में चंदन, पुष्प, अक्षत, दीप, नैवेद्य, जल, फल और सौभाग्य वस्तुएं सजी थीं। इन्हें श्रद्धालुओं ने मंत्रोच्चार के साथ भगवान के चरणों में अर्पित किया। दाहोद गुजरात से आए अजीत कुमार व संगीता बेन को शांतिधारा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उत्सव में विभिन्न प्रांतों के भक्तों ने भगवान ऋषभदेव का पूजन किया। इस अवसर पर दिल्ली, गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, असम, कर्नाटक सहित अन्य जिलों के सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे।
ऐतिहासिक जैन मंदिर में 60 वर्ष पूर्व स्थापित हुई भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा न केवल जैन श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, बल्कि अयोध्या के धार्मिक समरसता की जीवंत मिसाल भी है। जैन मंदिर के पीठाधीश रवींद्र कीर्ति स्वामी ने बताया कि आचार्य देश भूषण ने मंदिर में मूर्ति की स्थापना 1965 में की थी। जयपुर के मकराना पत्थर से बनी प्रतिमा को अंतिम रूप मंदिर परिसर में ही दिया गया। उन्होंने बताया कि समारोह में मंदिर की यात्रा, स्थापना का इतिहास और जैन संस्कृति के संरक्षण में इसके योगदान को भी रेखांकित किया गया।