अयोध्या। नाका की रहने वाली शोभा अक्षर आज साहित्यिक और बौद्धिक जगत में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं। वह न केवल एक मुखर स्त्रीवादी लेखिका और कवयित्री हैं, बल्कि एक चिंतक के रूप में भी सक्रिय हैं। उनकी कलम जेंडर इक्वालिटी, सामाजिक न्याय और यौनिकता जैसे मुद्दों पर बेबाकी से आवाज उठाती है।
वर्तमान में शोभा, हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका हंस में संपादन सहयोगी के पद पर कार्यरत हैं, जिसे महान साहित्यकार प्रेमचंद ने स्थापित किया था। इसके साथ ही पाखी पत्रिका में उनका मासिक स्तंभ द पर्पल पॉइंट पाठकों के बीच खासा लोकप्रिय है। हिन्दवी ने उन्हें वर्ष 2025 की शृंखला नई सृष्टि, नई स्त्री में शीर्ष 21 समकालीन कवयित्रियों में शामिल किया है, जो उनके लेखन की धार और प्रभाव को प्रमाणित करता है। उनकी कविताएं हिन्दवी, जनमत, स्त्री दर्पण सहित अनेक डिजिटल और प्रिंट माध्यमों में लगातार प्रकाशित होती रही हैं।
शोभा का जुड़ाव केवल लेखन तक सीमित नहीं है। वह देश-विदेश के विभिन्न साहित्यिक आयोजनों और फिल्म फेस्टिवलों में बतौर वक्ता आमंत्रित होती रही हैं। वह निर्मल पांडेय अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल की दो वर्षों तक ज्यूरी सदस्य भी रह चुकी हैं। उनका साहित्यिक योगदान सफीरों के नाम, अभी दिल्ली दूर है जैसी पुस्तकों के संपादन सहयोग से लेकर, मौसम बदलने की आहट कविता संग्रह और जनरव जैसी किताबों में उनकी रचनाओं तक फैला है।
पत्रकारिता और जनसंचार में स्वर्ण पदक के साथ परास्नातक करने वाली शोभा अमलतास कैफे नामक साहित्यिक यूट्यूब चैनल की संस्थापक भी हैं। उन्हें अयोध्या रत्न पुरस्कार, नारी सरोकार सम्मान और वूमन एक्सीलेंस अवार्ड जैसे कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। लगभग आठ वर्षों से साहित्य, सिनेमा और समाज के बीच सेतु बनीं शोभा आज की युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा हैं। उनके लेखन में जहां संवेदना है, वहीं बदलाव की मजबूत चेतना भी है।