19r- मृदंग सम्राट स्वामी पागल दास
अयोध्या। छंद, बंध, गति, ताल, लय जिनह, मृदंग यह बास। धन्य गणी ऐसे सुभग स्वामी पागल दास...। स्वामी पागल दास को समर्पित यह पंक्तियां उनकी अद्भुत संगीत साधना को प्रदर्शित करती हैं। स्वामी पागल दास ने संगीत की दुनिया में पखावज को फिर प्रतिष्ठित करने का काम किया। अवध से निकलकर देश-विदेश के कोने-कोने में मृदंग की स्वर धारा बहने लगी थी। संगीत नाटक अकादमी अयोध्या में 19 व 20 को पागल दास की पुण्यतिथि के अवसर पर ध्रुपद समारोह आयोजित करने जा रही है तो उनकी स्मृति जीवंत हो उठना लाजिमी है।
पखावज वादन में उनकी अद्भुत निपुणता के चलते उन्हें मृदंग सम्राट कहा जाता था। मझोली राज (देवरिया) की रहने वाली जानकी देवी ने 15 अगस्त, 1920 को बेटे को जन्म दिया। उसका नाम रामशंकर रखा। उनको भी नहीं मालूम था कि यही रामशंकर एक दिन उनको अंतरराष्ट्रीय ख्याति के मृदंगाचार्य स्वामी पागलदास की जननी बना देगा। रामशंकर 13-14 वर्ष की उम्र में भागकर अयोध्या चले आए। बंगाली बाबा नाम से प्रसिद्ध महंत रामकिशुन दास से दीक्षा लेकर हनुमानगढ़ी के बाबा रामसुखदास के यहां रहने लगे।
उनके भीतर सोई अभिनय की आकांक्षा उन्हें पटना के प्रसिद्ध संगीतज्ञ नेपाल सिंह के पास ले गई। जहां उन्होंने पांच वर्षों तक तबला बजाना सीखा। इसके बाद 20 वर्षों तक अयोध्या के स्वामी भगवानदास, बाबा ठाकुरदास व राम मोहिनीशरण से मृदंगवादन की शिक्षा ली। पंडित संतशरण ''''मस्त'''' के पास आकर उनका शिष्यत्व ग्रहण कर लिया और अगले 10 वर्ष तबला वादन के नाम कर दिए। इन्हीं संतशरण ''''मस्त'''' ने उन्हें रामशंकर से पागलदास बनाया। बाद में अवध विश्वविद्यालय ने उन्हें डीलिट की मानद उपाधि से भी सम्मानित किया। अब तक उनके खाते में देश के कोने कोने के दर्जनों प्रतिष्ठित संगीत संस्थानों के सम्मान, अभिनंदन और उपाधियां आ चुकी थीं। स्वामी पागलदास संगीत सभाओं व समारोहों की शान बन गए। कोई उनको मृदंग का उद्धारक या पुनः प्रतिष्ठापक कहता तो हंसकर टाल जाते या इसे खुद मृदंग का ही चमत्कार बताने लगते। उन्होंने प्रमोदवन में संगीताश्रम की स्थापना की।
राम इच्छा, उनका तकिया कलाम था
उनके शिष्य विजयराम दास बताते हैं कि स्वामी जी की दो पुस्तकें रश्ना रसायन (दो भाग) और श्रीहनुमत चरितामृत नाम से प्रकाशित हुई थीं। श्रेष्ठ कला आचार्य स्वामी पागल दास ने संगीत की दुनिया में पखावज को फिर प्रतिष्ठित किया है। तानसेन, गोपाल नायक, राम सहाय, कुदऊ सिंह, स्वामी हरिदास की परंपरा का ही निर्वहन स्वामी जी ने किया था। किसी भी विषय पर बातचीत करने पर हंसी मजाक सहित राजनीति, साहित्य, अध्यात्म, संस्कृति सभी में वे अपने अनुकूल लगते थे। राम इच्छा, उनका तकिया कलाम था।