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Ayodhya News: भगवान का जन्मोत्सव मनाने पृथ्वी पर पहुंचे इंद्र

Mon, 03 Mar 2025 10:05 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
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अयोध्या। भगवान का जन्म होने पर देवभवनों व स्वर्ग में स्वयं घंटे आदि बजने लगते हैं और इंद्र का आसन कंपायमान हो जाते हैं। इससे उन्हें भगवान के जन्म का निश्चय हो जाता है। सभी इंद्र व देव भगवान का जन्मोत्सव मनाने को बड़ी धूमधाम से पृथ्वी पर आते हैं। कुबेर नगर की अद्भुत शोभा करते हैं। भगवान ऋषभदेव के जन्मोत्सव के साथ यह पटकथा रायगंज स्थित दिगंबर जैन मंदिर में मोहक नाट्य के रूप में प्रस्तुत हुई।
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न केवल स्वर्ग की आभा-प्रभा और वैभव का भान कराते मंच, बल्कि कलाकारों का परिधान, उनकी भाव-भंगिमा और सधा अभिनय कुछ पल के लिए सृष्टि के आरंभ के उसी दौर में खींच ले गई, जब भगवान ऋषभदेव ने गर्भ धारण किया होगा। नाट्य प्रस्तुति के क्रम में ही ऐरावत हाथी पर भगवान को लेकर इंद्र सुमेरू पर्वत की ओर चलते हैं। वहां पहुंचकर पांडुक शिला पर, भगवान का क्षीरसागर से देवों की ओर से लाए गए जल के 1008 कलशों से अभिषेक किया जाता है। इसी के साथ जैनमंदिर का विशाल प्रांगण मंगल गीतों, भांति-भांति के वाद्यों, पुष्प वर्षा और बधाई के आदान-प्रदान के प्रवाह से आच्छादित हो उठता है।
कुछ पलों की तैयारी के बाद मंदिर से नर्तकों-नाट्यकर्मियों, वादकों, गायकों से लेकर श्रद्धालुओं की अनेक मंडलियों से युक्त भव्य शोभायात्रा प्रस्थान करती है। जैन धर्म की सर्वोच्च साध्वी ज्ञानमती माता की प्रेरणा और प्रज्ञाश्रमणी चंदनामती माता और दिगंबर जैन अयोध्या तीर्थ क्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष रवींद्र कीर्ति स्वामी के मार्गदर्शन में निकली शोभायात्रा आस्था का संचार करती हुई सरयू तट तक पहुंची और वहां से वापस जैन मंदिर पहुंची। शोभायात्रा में अमरचंद जैन, विजयकुमार जैन, ऋषभ जैन, जैन दर्शन के मर्मज्ञ डाॅ. जीवनप्रकाश जैन, मनोज जैन, पंकज जैन, लल्ला जैन आदि के साथ उत्तरप्रदेश, गुजरात, बिहार, कर्नाटक, राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र व नेपाल, रूस से भी श्रद्धालु शामिल रहे।
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शोभायात्रा में पूरे उत्साह और प्रसन्नता से शामिल हुए जैन मंदिर के पीठाधीश रवींद्र कीर्ति स्वामी ने कहा कि आत्मा से परमात्मा बनने की पवित्र प्रक्रिया है, पंचकल्याणक। गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान और निर्वाण ये पांच कल्याणक होते हैं। कहा कि प्रभु का सच्चा भक्त, गुरु का सच्चा सेवक किसी से सम्मान नहीं चाहता है। परंतु वह प्रभु भक्ति, गुरु सेवा के फल से जगत से सम्माननीय हो जाता है। भक्ति से मुक्ति मिलती है। सेवा का फल मेवा मिलता है। प्रभु भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती, गुरु सेवा का फल शीघ्र प्राप्त होता है।
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