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विभाजन का दर्द: ट्रेनों में हो रही थी मारकाट...हर पल था मौत का खौफ; आज भी सिहर उठते हैं पाकिस्तान से आए परिवार

Wed, 14 Aug 2024 02:23 PM IST
शाहरुख खान नितिन मिश्र, अमर उजाला, अयोध्या

सार

आज भी बंटवारे का दंश याद कर पाकिस्तान से आए परिवार सिहर उठते हैं। परिवार में कुछ ने तो दर्द खुद झेला था और कुछ उस दर्द को सुनकर बड़े हुए।
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आज भी बंटवारे का दंश - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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देश के नक्शे पर 75 साल पहले खींची गई विभाजन की लकीर ने लाखों लोगों को बेघर कर दिया। उन्हें अपना घर-बार छोड़कर दर बदर होना पड़ा। लाखों लोग पाकिस्तान से भागकर हिंदुस्तान पहुंचे। यहां मेहनत और लगन के बल पर खुद को स्थापित किया। कारोबार की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई एक नया मुकाम हासिल किया। लेकिन उस दौर को याद करते ही आज भी सिहर उठते हैं। 
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परिवार में कुछ ने तो दर्द खुद झेला था और कुछ उस दर्द को सुनकर बड़े हुए। सिंधु एकता मंच के राष्ट्रीय जनसंपर्क अधिकारी ओम प्रकाश ओमी कहते हैं कि सिंधी परिवारों की आंखों में विभाजन का मंजर आज भी तैर रहा है। ये परिवार अपनों को याद कर दुखी होते हैं।

खाली हाथ आईं थी सरस्वती, आज बड़ा कारोबार
सिंधी कॉलोनी रामनगरी निवासी 90 वर्षीय सरस्वती देवी बंटवारे के बाद पूरे परिवार के साथ कराची से ट्रेन के माध्यम से भारत पहुंचीं थीं। ट्रेनों में उपद्रवी लूटपाट व मारकाट कर रहे थे, हर पल मौत का खौफ था। 
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भारत आने के बाद वे उत्तर प्रदेश के बस्ती शहर में रहने लगीं। कुछ दिन बाद फैजाबाद की स्थायी निवासी हो गई। जब पाकिस्तान से आईं तो उनके हाथ खाली थे। इसके बाद पति स्व. चंचल दास के साथ बीड़ी का कारोबार शुरू किया। सिंधी बीड़ी का बड़ा कारोबार है। प्रतिष्ठित कारोबारियों में इनकी गणना होती है।
 

वो मंजर याद कर कांप जाती है रूह
पाकिस्तान के सिंध की रहने वाली 91 वर्षीय ईशा देवी कहती हैं कि आज भी बंटवारे का वो खौफनाक मंजर उनके जेहन में है। समुद्र के रास्ते किसी तरह सात दिनों में भारत पहुंच सकीं। पानी के जहाज में ही उन्होंने एक पुत्री को जन्म दिया। घर, संपत्ति, जमीन, जायदाद, खेत सब छोड़कर आना पड़ा। कई अपनों की लाशें देखीं थीं। वो मंजर याद कर आज भी रूह कांप जाती है। जब हम भारत आए तो हमारे पास न सिर पर छत थी न ही कोई आजीविका। आज इनकी गणना शहर के ईंट भट्ठे के बड़े कारोबारियों में होती है।

पाकिस्तान छूट गए, भाई, बहन व रिश्तेदार
रामनगर निवासी 93 वर्षीय नवलराम की उम्र बंटवारे के वक्त 17 वर्ष थी। सिंध प्रांत में खुशहाल परिवार था। विभाजन हुआ तो भाई, बहन व रिश्तेदार वहीं छूट गए, यह कहते हुए उनकी आंखें भर आती हैं। बताया कि ट्रेन से भारत पहुंचे थे। ट्रेनों में मारकाट हो रही थी, कुछ लोग सभी का नाम पूछ रहे थे।
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विशेष वर्ग का होने के कारण उनका सिर तलवार से काट दिए जा रहे थे। बहुत सारी औरतें ट्रेन से ही कूद गईं थीं। ट्रेन में दो दिन तक भूखे-प्यासे रहे। कई बोगियाें में लाशों के ढेर दिखाई दे रहे थे। भारत आने पर एक हजार स्कवायर फीट का मकान सरकार की ओर से मिला था।
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