अयोध्या। डरा-धमकाकर विवाह के फर्जी कागजात तैयार कराने के मामले में आरोपी महेंद्र त्रिपाठी को 24 साल बाद अदालत ने सबूत के अभाव में बरी कर दिया। महिलाओं के संरक्षण के लिए गठित विशेष अदालत की मजिस्ट्रेट निवेदिता सिंह ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष घटना की मूल बात को ही गवाहों के जरिए साबित नहीं कर सका।
अभियोजन के अनुसार महिला थाना में 29 नवंबर 2002 को रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि टकसाल निवासी सुरेंद्र उपाध्याय की बेटी का विवाह अरविंद से कराने के लिए बातचीत चल रही थी। इसी दौरान युवती के रिश्ते के जीजा महेंद्र त्रिपाठी ने अरविंद और शैल त्रिपाठी से सांठगांठ कर ली।
आरोप था कि युवती को बदनाम करने की नीयत से उसे कचहरी ले जाकर विवाह संबंधी फर्जी कागजात तैयार कराए गए। साथ ही किसी को कुछ बताने पर धमकी दी गई। बाद में अरविंद से जानकारी मिलने पर पता चला कि बिना विवाह हुए ही महेंद्र त्रिपाठी ने सीमा उपाध्याय और अरविंद के नाम से शादी का अनुबंध पत्र तैयार कराया था।
बचाव पक्ष की गवाह निशा ने अदालत में बयान दिया कि महिला थाना अध्यक्ष ने झूठा मुकदमा दर्ज कराया था। उसने बताया कि उस पर भी कई गंभीर आरोप लगाए गए थे और उसे कई दिनों तक थाने में बैठाए रखा गया। बाद में उसे नारी संरक्षण गृह भेज दिया गया।
अदालत ने पत्रावली पर उपलब्ध तथ्यों, गवाहों के बयानों और बचाव पक्ष की दलीलों पर विचार करने के बाद महेंद्र त्रिपाठी को सभी आरोपों से दोषमुक्त करते हुए बाइज्जत बरी कर दिया।