यानी हे तपस्विनी, तुम्हारे आहार नियमों में कोई बाधा तो नहीं? तुम प्रशांत जीवन तो व्यतीत कर रही हो न? हे मृदुभाषिणि, तुम अपने गुरु की सेवा में अपने आप को धन्य तो बना रही हो न?
वन में रहने वाली वृद्धा को एक चक्रवर्ती सम्राट कैसे संबोधित करता है। यह वास्तव में इस पावन धरा का ही चरित्र हो सकता है। या दूसरी तरह से देखें तो वनवासिनी की तपस्या में इतना बल हो सकता है कि एक चक्रवर्ती सम्राट स्वयं उसके दर तक आए। अब इससे बड़ा परमानंद शबरी के जीवन में कहां होगा। श्रीरामचरितमानस के अरण्यकांड में लिखा है-
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुं आनि।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि॥
यानी माता शबरी ने रसीले और स्वादिष्ट कंद, मूल और फल लाकर श्री रामजी को दिए। प्रभु ने बार-बार प्रशंसा करके उन्हें प्रेम सहित खाया॥ शबरी के उद्धारक श्रीराम फिर शबरी माता जानकी के बारे में बताती हैं
पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहं होइहि सुग्रीव मिताई॥
सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूं पूछहु मतिधीरा॥
शबरी कहती हैं- हे रघुनाथजी, आप पंपा सरोवर जाइए। वहां आपकी सुग्रीव से मित्रता होगी। हे देव, वह सब हाल बतावेगा। हे धीरबुद्धि, आप सब जानते हुए भी मुझसे पूछते हैं। अरण्यकाण्ड में फिर लिखा है-
कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदय पद पंकज धरे।
तजि जोग पावक देह परि पद लीन भइ जहं नहिं फिरे॥
यानी सारी कथा कहकर भगवान के दर्शन कर, उनके चरणकमलों को धारण कर लिया और योगाग्नि से देह को त्यागकर वह उस दुर्लभ हरिपद में लीन हो गई, जहां से लौटना नहीं होता। माता शबरी भील समाज से आती थीं। ऋषियों की सेवा में पूरा जन्म लगाया और अंत में प्रभु के दर्शन के बाद स्वयं ही देह छोड़ दी। इधर श्रीराम उन्हें भामिनी कहते हैं, उनके चखे फल खाते हैं, सीता को खोजने में मदद मांगते हैं और अंत में मुक्ति देते हैं। भारतभूमि की इसी सांस्कृतिक विशिष्टता ने माता शबरी को अमर बना दिया। इसीलिए तो अयोध्या का मंदिर विश्व के लिए श्री रामायण का संदेशवाहक, दिग्दर्शक व मार्गदर्शक भी है। जब हम कहते हैं सबके राम, तो श्री रामायण का यही सार संसार के हर वर्ग, श्रेणी के प्राणी को गले लगाने का संदेश भी है।