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बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को सिखा रहे योग

Mon, 16 Apr 2018 12:12 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो औरैया
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योग शिविर में योग सिखाते कृष्ण कुमार सिंह (सबसे दाएं)। - फोटो : amarujala
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दिबियापुर (औरैया)। पहला सुख निर्मल काया, दूसरा सुख जेब में हो माया। इसी सिद्धांत को अमल में रखते हुए प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य कृष्ण कुमार सिंह का विश्व योग दिवस से लोगों को योग सिखाने का जुनून आज भी जारी है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक लगभग 500 लोग उनसे योग का प्रशिक्षण ले चुके हैं। आगामी 21 जून को होने वाले विश्व योग दिवस के लिए वह शिविर में प्रशिक्षण दे रहे हैं।

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21 जून 2017 को प्राथमिक विद्यालय रामपुर की मड़ैया ब्लॉक भाग्यनगर के प्रधानाध्यापक कृष्ण कुमार सिंह ने नारायणी मंडपम में निशुल्क योग शिविर शुरू किया। कृष्ण कुमार सिंह का कहना है कि उन्होंने बीपीएड की ट्रेनिंग में योग को एक विषय के रूप में पढ़ा। पिछले वर्ष विश्व योग दिवस के अवसर पर उन्हें नारायणी मंडपम दिबियापुर में योग सिखाने का अवसर प्राप्त हुआ।

इसके बाद दिबियापुर के लोगों की ललक के चलते वह प्रतिदिन ही लोगों को निशुल्क योग सिखाने लगे। नारायणी मंडपम में लगभग छह महीने तक चले निशुल्क योग शिविर में लगभग दो सैकड़ा लोगों ने योग सीखा।   रामपुर की मड़या के प्राथमिक विद्यालय में भी वह प्रतिदिन सुबह प्रार्थना सभा के दौरान योग सिखाते हैं।
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इस समय दिबियापुर में नगर पंचायत कार्यालय पर प्रतिदिन तड़के योग शिविर में लगभग 24 से अधिक लोग योग सीखने आ रहे हैं। अब तक ग्राम लहोखर, डायट अजीतमल समेत कई अन्य विद्यालयों में जाकर लोगों को योग के बारे में बता चुके हैं।  उन्होंने बताया कि शिक्षकों की एक बहुत बड़ी संख्या उनका सहयोग कर रही है। कई शिक्षक लोगों को योग प्रशिक्षण देनें में भी सक्षम हो गए हैं। इनमें प्रधानाध्यापक रामप्रकाश गुप्ता का नाम प्रमुख है। दवा व्यवसायी हरिश्चंद्र पोरवाल भी योग की विभिन्न क्रियाएं लोगों को सिखाने में उनके साथ कदमताल करते हैं।

विद्यालय में योग के लिए वातावरण तैयार करने को लगाई औषधीय वाटिका
प्रधानाध्यापक कृष्ण कुमार सिंह का कहना है कि स्कूल में योग का वातावरण तैयार करने के लिए स्कूल परिसर को हरा भरा बनाया है। इसके साथ ही सेब, बादाम, अंगूर, अंजीर, ऐलोवेरा, तुलसी वाटिका, नीम, गठिया वात के लिए हरशृंगार समेत 200 पौधे लगाए हैं। गांव के लोग भी उनके इस अभिनव प्रयोग में सहभागी बन रहे हैं। सभी पौधों में गांव के लोग आकर पानी डालते हैं।

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