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तीस हजार लीटर पानी रोज शोधन में हो रहा बर्बाद

Tue, 03 Apr 2018 11:35 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो औरैया
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छोटा हाथी में आरओ वाटर लेकर जाता कर्मचारी। - फोटो : amarujala
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औरैया। तापमान बढ़ते ही जिले में पानी की खपत बढ़ने लगी है। पानी साफ चाहिए लिहाजा लोग आरओ का पानी तलाशते हैं। ऐसे में आरओ प्लांट लगाने वालों की बाढ़ सी आ गई है। शहर और कस्बा में लगभग दो दर्जन आरओ प्लांट लगे हैं। विशेषज्ञों की माने तो पानी शोधन के नाम पर यहां 30 हजार लीटर पानी बर्बाद होकर नालियों में बह रहा है।

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शहर के मोहल्ला तिलक नगर, ब्रह्मनगर, सत्तेश्वर, ओमनगर, नगर दिबियापुर, बिधूना, अजीमतल, अटसू, फफूंद, अछल्दा क्षेत्र में आरओ प्लांट खुले हैं। प्रत्येक प्लांट पर डेढ़ से दो हजार लीटर पानी शोधित किया जाता है। पानी शोधित करने में आधा बर्बाद होता है। 15 लीटर पानी शुद्ध करने में 30 लीटर पानी लगता है।

20 से 30 रुपये डिब्बा दिया जा रहा पानी
शहर के मोहल्ला सत्तेश्वर निवासी विमलेश कुमार का कहना है कि दो से तीन साल पहले तक जिले में आरओ प्लांट की संख्या छह या सात थी। वर्तमान समय में दो दर्जन प्लांट चल रहे हैं। पानी के दाम में बढ़ोत्तरी हुई है। दो वर्ष पहले तक 15 रुपये डिब्बा पानी मिलता था। अब यह एक  डिब्बा 20 से 25 रुपये में दिया जा रहा है।
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नगर पालिका में भी तैयारी
नगर पालिका के जेई जलकल विकास चौहान का कहना है कि सभी आरओ प्लांट को नोटिस दिया जाएगा। वह पानी की खींचकर शोधन के नाम पर बर्बाद कर रहे हैं। नगर पालिका समय-समय पर अपनी टंकी में सुरक्षित क्लोरीन व अन्य दवा डालकर पानी को शुद्ध बनाती है। अब इस और सुदृण बनाने की योजना तैयार की जा रही है।

क्या है आरओ
आरओ का मतलब रिवर्स आस्मोसिस है। इस प्रक्रिया से पानी का भारीपन दूर होता है। जल शोधकों में से एक आरओ प्रक्रिया खासतौर से दूषित पानी वाले इलाकों में आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे विषाक्त पदार्थों को शोषित कर देता है। बेकार पानी में सल्फेट कैल्शियम, बाईकार्बोनेट्स जैसे पूरी तरह विघटित लवण और कार्बनिक पदार्थ तथा आर्सेनिक और फ्लोराइड उच्च मात्रा में होते हैं। शोधन में अशुद्धिया दूर हो जाती हैं।

क्या कहते हैं चिकित्सक
जिला अस्पताल के चिकित्सक डॉ.एमयू खान कहते हैं आरओ पानी का ज्यादा इस्तेमाल से शरीर में लवण की कमी हो सकती है। पैकिंग वाला पानी लगातार लंबे समय तक पीने से स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और लगातार सेवन ह्रदय संबंधी विकार, थकान महसूस होना, मानसिक कमजोरी और माश पेंशियों में एठन या सिरदर्द जैसे कई रोग हो सकते हैं। क्योंकि शोध से पता चला है कि जब आरओ पानी फिल्टर करता है तो वह इस  पानी से अच्छे व खराब मिनरल्स को पूरी तरह निकाल देता है। उस मशीन को अच्छे और खराब मिनरल्स की पहचान नहीं होती। जहां तक संभव हो क्लोरीन का इस्तेमाल करें। जिससे पानी में उपस्थित लाभ दायक बैक्टीरिया नष्ट नहीं होते और इसकी तुलना में यह काफी सुरक्षित होता है। बेहतर होगा कि नियमित आरओ के पानी का इस्तेमान न करें।

कौन करे जांच जनता परेशान
औरैया। जिला खाद्य एवं औषधि अधिकारी जीके दुबे का कहना है कि हमारे एक्ट में सिर्फ पैकेजिंग, ड्रिंकिंग वाटर के नमूने लेने का अधिकार है। समय-समय पर पानी की जांच कराते हैं। हालांकि जिले में अशुद्ध पानी की सप्लाई होने की संभावना कम है।

टैंकों का कराना चाहिए निर्माण
समाजसेवी संस्था एक विचित्र पहल के संयोजक आनंद नाथ गुप्ता का कहना है कि आरओ वाटर संचालकों को शोधित जल को संचित करने के लिए टैंकों का निर्माण कराना चाहिए ताकि इस पानी का प्रयोग खेती व बागवानी को सिंचित करने अथवा अन्य किसी काम में प्रयोग में लाया जा सके। पानी सीमित है और इसे संरक्षित करने की जरूरत है। समय रहते इस ओर ध्यान न दिया गया तो आने वाली पीढ़ी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
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