शहीद हुए एसपी की पत्नी व बच्चों के साथ फाइल फोटो
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मथुरा में शहीद हुए एसपी मुकुल द्विवेदी 15 दिन पहले गांव आए थे और लोगों को भरोसा दिया था कि दोबारा आएंगे तो कई दिन गांव में रुकेंग। लेकिन गुरुवार को उनकी मौत की खबर आई। ऐसे में गांव के लोग सुबकते नजर आए।
मुकुल ने 15 दिन पहले गांव आकर माता-ृपिता से आर्शीवाद लिया था। पड़ोसियों से मिलकर कुशलक्षेम पूछी थी। मगर समय के चक्र ने सारी खुशियां पल भर में गमों में तब्दील कर दी। शहीद एसपी मुकुल के दो बेटे कौैस्तुब(14) और आयुष (9) गर्मियों की छुट्टियों में अपने दादा-दादी के पास चले आए। करीब दस दिन तक वह दादा दादी के पास रहे। 15 दिन पहले मुकुल भी पत्नी अर्चना के साथ गांव आए। मिलनसार स्वभाव के मुकुल गांव के सभी लोगों से मिले। दूसरे दिन बच्चों को लेकर मथुरा लौट गए।
पुलिस अधिकारी न बनते तो होते पत्रकार
औरैया। मथुरा में शहीद हुए एसपी मुकुल का कहना था कि अगर वह पुलिस अधिकारी न बनते तो वह पत्रकार बन जाते। लोग बताते हैं कि उनके कार्य करने का उद्देश्य था कि वह पीड़ितों को न्याय दिला सके। इसके लिए वह शुरू से संघर्षरत थे। आगरा में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी करने वाले मुकुल द्विवेदी का रुझान पत्रकारिता की तरफ भी था। उनका मानना था कि पत्रकार बनकर भी वह लोगों की आवाज उठा सकते हैं और उन्हे न्याय दिला सकते हैं। मुकुल के चाचा महेश चंद्र द्विवेदी डीजीपी जैसे बड़े पद पर रहे।
मुकुल के अंदर पुलिस अधिकारी बनने की भी तमन्ना थी। 1998 में मुकुल ने पीपीएस परीक्षा पास कर ली। 2000 में उन्हें पहली ज्वानिंग मेरठ में मिली थी। उनके गांव के ही लोग बताते हैं कि जब मुकुल गांव आते थे तो कई संस्मरण सुनाते थे। तमाम संस्मरण गांव वालों की जुबान पर हैं। गांव वाले बताते हैं कि मुकुल अक्सर कहा करते थे कि वह अगर पुलिस अधिकारी न बनते तो पत्रकार बन जाते।
मिलनसार और मृदुभाषी थे मुकुल
मानीकोठी गांव के राजू, अमित, रामकिशन ने बताया कि मुकुल जब गांव आते थे तो किसी को अफसर होने का एहसास नही होने देते थे। ग्रामीणों ने बताया कि मुकुल शुरू से ही मृदुभाषी और सरल स्वभाव के थे। गांव के लोगों से सुख-दुख पूछना और मदद करना उनके परिवार के संस्कार थे। गांव वालों का कहना है कि मुकुल के चाचा महेश डीजीपी रहे। इतने बड़े पद पर रहने के बाद भी सभी से मिलते-जुलते रहे।