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Auraiya News: असली न नकली... खाद की बोरियों में पूरी रेत

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फोटो-35-पकड़ी गई नकली डीएपी की बोरियां। स्रोत: आर्काइव
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औरैया। नकली खाद के कारोबार में पकड़े गए जालसाज बहुत शातिर निकले। ये इफ्को और इंडोरामा जैसी नामी कंपनियों की बोरियों में रेत भर कर बेच रहे थे। नमूनों की जांच में इसका खुलासा हुआ है।
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ककोर स्थित प्लास्टिक सिटी के एक घर में डेढ़ माह पहले नकली डीएपी खाद की फैक्टरी पकड़ी गई थी। कृषि विभाग ने पैक मिलीं इफ्को और इंडोरामा कंपनी की बोरियों से जांच के लिए डीएपी के दो नमूने भेजे थे। जांच में दोनों ही नमूनों में शत प्रतिशत रेत मिली है। फास्फोरस और नाइट्रोजन की मात्रा न के बराबर मिली। अब पुलिस विवेचना में इस जांच रिपोर्ट को भी शामिल किया जाएगा।

जिलाधिकारी इंद्रमणि त्रिपाठी के आदेश पर 12 नवंबर को रात 10 बजे प्लास्टिक सिटी स्थित एक मकान में जिला कृषि अधिकारी शैलेंद्र कुमार सिंह व अन्य ने छापा मारा था। यहां नामी कंपनियों की डीएपी की बोरियां, सिलाई मशीन और डीएपी की पैक्ड बोरियां मिली थीं। टीम ने मौके से पांच लोगों को गिरफ्तार कर 138 बोरी डीएपी और 113 खाली बोरियां बरामद की थीं। इफ्को की डीएपी और इंडोरामा कंपनी की डीएपी के दो नमूने लेकर जांच के लिए भेजे गए थे।
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कृषि विभाग और पुलिस दोनों को ही जांच रिपोर्ट का इंतजार था। दरअसल रिपोर्ट से ही यह साबित होना था कि आखिर डीएपी में मिलावट थी या डीएपी नकली थी। बीते सप्ताह जांच रिपोर्ट आई तो अफसरों के होश उड़ गए। जांच रिपोर्ट के अनुसार डीएपी में रेत के अलावा और कुछ नहीं था। इसमें एक प्रतिशत से भी कम नाइट्रोजन और फास्फोरस था। असली डीएपी में 18 प्रतिशत नाइट्रोजन और 46 प्रतिशत फास्फोरस होता है।





डीएपी का घोल बनाकर करते थे स्प्रे



सूत्रों के अनुसार रेत से नकली डीएपी बनाने के लिए प्लानिंग की गई थी। पहले असली डीएपी को पानी में घोला जाता था। इसके बाद इसमें काला रंग मिलाकर इसका स्प्रे रेत और मिट्टी पर किया जाता था। इससे रेत से डीएपी की तरह फास्फोरस और नाइट्रोजन की गंध आती थी, जिससे किसानों को भी शक नहीं होता था।





ये आरोपी हुए थे गिरफ्तार

नकली डीएपी बनाने की फैक्टरी से कुल पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें लुखरपुरा निवासी मकान मालिक प्रीतम सिंह के अलावा कानपुर देहात के झींझक निवासी सौरभ यादव, दिबियापुर के ऊमरसाना निवासी दीपक व मुकेश और याकूबपुर निवासी विपिन हैं। जिला कृषि अधिकारी ने दिबियापुर थाने में सभी के खिलाफ प्राथमिक दर्ज कराई थी। पांचों आरोपी जेल में हैं।





बर्बाद फसल की कैसे होगी भरपाई



नकली डीएपी की फैक्टरी तो पकड़ी गई लेकिन जिन किसानों ने यह डीएपी खरीदी उनकी भरपाई कैसे होगी, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. रामपलट ने बताया कि नकली डीएपी डालने से फसलें प्रभावित होना तय है। दूसरी तरफ डीएपी में मिला रेत भूमि को भी बंजर बनाता है।





ऐसे तलाशते थे डीएपी के लिए ग्राहक

आलू और गेहूं की बुवाई के दौरान बीते कई सालों से डीएपी की किल्लत चल रही है। इसी का फायदा उठाकर जालसाजों ने नकली डीएपी बनाने की फैक्टरी शुरू की थी। आरोपियों का एक साथी सहकारी गोदाम के बाहर रहता था। यहां डीएपी मिलने में परेशान किसानों को आसानी से डीएपी उपलब्ध कराने की बात कहकर फंसा लेता था। इसके बाद गोदाम पर फोन कर डीएपी दे दी जाती थी। पुलिस इसकी भी जांच कर रही है कि कहीं आसपास के जिलों में तो इसकी आपूर्ति नहीं हो रही थी।





प्लास्टिक सिटी में पकड़ी गई नकली डीएपी की फैक्टरी से दो नमूने लेकर जांच के लिए भेजे गए थे। दोनों नमूने नकली पाए गए हैं। इनमें एक प्रतिशत भी फास्फोरस और नाइट्रोजन नहीं था। पुलिस मामले की विवेचना कर रही है। पुलिस को जांच रिपोर्ट भेज दी जाएगी। -शैलेंद्र कुमार सिंह, जिला कृषि अधिकारी।

फोटो-35-पकड़ी गई नकली डीएपी की बोरियां। स्रोत: आर्काइव

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