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बीहड़ में अब बंदूक नहीं, गूंजती है तो सिर्फ शहनाई

Sun, 01 Feb 2015 12:51 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, औरैया
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कभी गोलियों की तड़तड़ाहट से दहशतजदां बीहड़ डकैतों के सफाए के बाद अब शहनाई की गूंज से गुंजायमान होने लगा है। आज गांव में सहालग के दिनों में शादी वाले घर में शहनाई भी बजती है और लोगों चेहरों पर हंसी खुशी दिखाई देती है।
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1965 से लेकर 2005 तक डकैतों की सरपरस्ती में जीवन जी रहे मढ़ापुर से लेकर बढ़ेरा तक के बीहड़ गांवों में अब चैन की बंशी बजती है।

पूर्व के हालातों पर नजर डाले तो बीहड़ी गांवों मढ़ापुर, अस्ता, महमूदपुर, भासौन, चौकी, जगतपुर, सड़रापुर, सिहौली, बीजलपुर, सिखरना, करके का पुर्वा, फरिहा, असेवा, बरबटपुर, असेवटा, बवाइन, कैथौली, जुहीखा, गूंज, ततारपुर, गोहानी खुर्द, सिकरोड़ी, गोपालपुर आदि में डकैतों के आतंक के चलते सुविधाओं का भी टोंटा था।

लोग न तो अपनी लड़कियों की शादी करना पसंद करते थे और न ही यहां की लड़की को अपने घर की दुल्हन बनाना।
 
दुल्हन की डोलियां शहरों में जाना या फिर शहरों से डोलियां गांव आना इन बीहड़ी क्षेत्र के ग्रामीणों के लिए एक सपना हो गया था। इसके चलते लोग आपस में ही रिश्तेदारियां तय करने को मजबूर थे। ऐसी स्थिति में बीहड़ के युवा गांव में शादी करने की बजाय कुंवारा रहना ही पसंद करते थे।
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अब ढाई दशक बाद अब यहां अमन और चैन ही दिखाई देता है। अब लोगों में न तो बीहड़ की बेटी ब्याहने में कोई गुरेज है और न ही यहां लड़कों की बारात लाने में परहेज।
 
शान शौकत से निकलने वाली बारातों में शामिल लोग- दूल्हे का सेहरा सुहाना लगता..., आए हम बाराती.. आदि गानों पर नाचते थिरक कर पूरा आनंद लेते हैं।

डाकुओं के आतंक से बीहड़ के गांव जब से मुक्त हुए हैं तब से इन गांवों में मूलभूत सुविधाएं सड़कें, बिजली, शिक्षा आदि, स्वास्थ्य आदि ने गांव का नजारा ही बदल कर रख दिया है।

दिनभर सुनसान रहने वाली सड़कें भी अब देर रात तक चलायमान रहने लगी हैं। इस संबंध में सराय इमलिया के प्रधान निहाल सिंह गुर्जर, जगतपुर प्रधान शिव कुमार राठौर बताते हैं कि डाकुओं की समाप्ति के बाद अब विकास ने रफ्तार पकड़ी है तो स्थितियां भी सामान्य हो गई हैं।
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