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सोचा भी नहीं था कि दो वक्त की रोटी के लिए हाथ फैलाने की नौबत आ सकती है

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औरैया। कोरोना के कहर से मेहनतकश सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। लॉकडाउन के चलते कामकाज ठप होने से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल हो रहा है। मेहनत मजदूरी करने वाले घरों में कैद हैं। दूसरे शहरों में फंसे हैं, वह हर ओर से निराश होकर घर पहुंचने की आस में पैदल ही चल दिए।
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पांव के छाले और पेट की भूख भी इनके कदम नहीं रोक पा रही है। पहली मई को मजदूर दिवस मनाया जाता है, लेकिन अबकी इस दिन मजदूरों का हाल बेहाल रहा। शुक्रवार को हाईवे पर कुछ इसी तरह की तस्वीर देखने को मिली। परिवार के गुजर बसर को लेकर सभी चिंतित हैं।
शुक्रवार को दोपहर लगभग 12 बजे मजदूरों की कई टोलियों हाईवे पर पैदल जाती दिखीं। इन मजदूरों ने बताया कि राजस्थान स्थित कंपनी में काम करते थे। वह राजस्थान से बिहार, गोरखपुर और महाराजगंज अपने घर वापस पैदल जा रहे थे। बताया कि उन्हें तीन दिनों से भोजन नहीं मिला था। पानी पीकर कदम बढ़ाए जा रहे थे। रास्ते में पुलिस ने उन्हें रोका तो लेकिन थर्मल स्क्रीनिंग कराकर आगे बढ़ा दिया, न तो साधन मुहैया कराया और न ही भोजन। आज शुक्रवार को उन्हें एक स्थान पर खिचड़ी मिली, जिससे पेट की भूख बुुझी। इन मजदूरों ने यह भी बताया कि उन्होंने चौराहे पर मौजूद पुलिस कर्मियों से ट्रक रोककर बैठाने की गुहार भी लगाई, साथ ही उन्होंने उनके पास मौजूद कुछ रुपये भी ट्रक चालक को देने की बात कही। लेकिन पुलिस कर्मियों ने ट्रक रोकने की जहमत नहीं उठाई।
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हाईवे पर लगाई गई रैलिंग पर बैठे गाजीपुर निवासी मजदूर सोनू ने बताया कि जब से लॉकडाउन लगा है। इस एक माह में सिर्फ दो दिन काम मिला। परिवार के गुजर बसर को लेकर चिंता है। न राशन कार्ड और न श्रम विभाग में पंजीकरण है, जिससे सरकारी मदद भी नहीं मिली है। घर में रखा धन खर्च हो चुका है। कर्जा भी ले चुके है। कर्ज चुकाने के लिए काम की तलाश में भटकना पड़ रहा है। आज लगभग 20 दिनों बाद खेत से भूसा ढोने का काम मिला है, जिससे मिलने वाली मजदूरी से परिवार का पेट पाल सकेंगे।
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