भगवान श्रद्धा और विश्वास से समर्पित भाव को प्रभु स्वीकार करते हैं। त्रेता में नर लीला व द्वापर में बाल लीला करके श्री हरि ने अपने भक्ताें की रक्षा व दुष्टाें का संहार किया।
अभिमान ही प्रभु का सबसे प्रिय भोजन है। अपने भक्ताें व देवताओं को जब-जब अभिमानित होकर भटकते देखा तो प्रभु ने उस अवसर का भक्षण करके भक्तों की बुद्धि शुद्ध कर उन्हें भटकने से बचाया।
गौरीपीट ज्योति आश्रम विद्यानगर बाबरपुर में श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में व्यास आचार्य पं. संतोष कुमार तिवारी ने कहा कि एक बार नारद को मोह उत्पन्न हो गया था, तब प्रभु ने वानर का रूप नारद को देकर उन्हें हरि चरणाें से भटकने से बचाया था। वहीं द्वापर में प्रभु ने श्री कृष्ण अवतार लेकर बाल लीलाओं से यशोदा, नंद बाबा, गोपी, ग्वालो व समस्त बृजवासियाें को आनंद प्रदान करते हुए दुष्टाें का संहार किया।
कहा कि एक बार इंद्र को अभिमान उत्पन्न हुआ। बृजवासियों द्वारा इंद्र की पूजा की जाती थी। इंद्र का अभिमान देख लीलाधारी कृष्ण ने गिरिराज की पूजा करवा कर इंद्र को कुपित कर दिया तो इंद्र ने असमय घनघोर बारिश शुरू कर दी। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अंगुली पर गिरिराज पर्वत धारण कर बृजवासियों की रक्षा की और इंद्र के अभिमान को चूर कर दिया, तब से श्री गिरिराज जी महाराज की पूजा अर्चना होती चली आ रही है। बुधवार को गिरिराज कथा प्रसंग पर छप्पन भोग का प्रसाद लगाकर वितरण किया गया। इस अवसर पर श्री पोरवाल, रमेश चंद्र पोरवाल, वेदप्रकाश, रामजी, अलका, आयुषी, ओमप्रकाश आदि सैकड़ाें भक्त मौजूद रहे।