आर्य समाज मंदिर पर चल रहे 103 वे वार्षिकोत्सव
कार्यक्रम के अंतिम दिन आचार्य राजदेव ने कहा कि ईश्वर परमात्मा का निज नाम
ओम है। आत्मा का निज नाम कृतु है। जो अच्छे कर्म करने के लिए बना है।
प्रवचन सुनने के लिए परिसर में आर्य बंधुओं का जमावड़ा रहा।
समापन
पर आर्य बंधुओं को संबोधित करते हुए आचार्य राजदेव ने अच्छे कर्मों की
व्याख्या की। कहा कि यज्ञोवई श्रेष्ठतम कर्म अर्थात यज्ञ सर्वश्रेष्ठ कर्म
है। यज्ञ का प्रसाद शुद्ध वायु है, जो सभी को सहज स्वीकार हो जाती है।
अग्नि
देवताओं का मुख है, इसलिए अग्निहोत्र करने से कर्म श्रेष्ठ होते हैं।
आचार्य उमेश कुलश्रेष्ठ ने कहा कि देवताओं के ऋण से मुक्त होने का सबसे
अच्छा उपाय यज्ञ है। इसलिए मनुष्य को यज्ञ अवश्य करना चाहिए। यज्ञ की शुद्ध
सामग्री का जिक्र करते हुए कहा कि यज्ञ हेतु गाय के शुद्ध घी के साथ ही
मंत्रों का शुद्ध उच्चारण होना जरूरी है।
इस दौरान भजनोपदेशक मोहित
शास्त्री ने कविरत्न प्रकाश का लिखा गीत सुनाते हुए अखिल विश्व में व्यापक
सत्ता, साक्षी देता पत्ता पत्ता सुनाया। स्वामी प्रभुवेश ने जल और अग्नि
की व्याख्या की। कहा कि जल की गति नीचे की ओर होती है, जबकि यज्ञ की अग्नि
की गति उर्धगामी होती है।
यज्ञ से वर्षा, वर्षा से अन्न और अन्न से
जीवन होता है। इसके पश्चात आर्य उप प्रतिनिधि सभा की बैठक हुई। इसमें
इटावा व औरैया जनपद के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसमें आर्यवीर दल शिविर
लगाने का निर्णय लिया गया। इसके बाद महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया।
प्रो.
आशा विश्नोई व डा. रामकुमारी गुप्ता ने मां की महत्ता पर प्रकाश डाला। इस
मौके पर आर्य समाज के पूर्व प्रधान डॉ. सर्वेश आर्य, आनंद आर्य, राजेंद्र
आर्य सहित सैकड़ों लोग मौजूद रहे।