शहादत का प्रतीक देवकली मंदिर के पास बना शहीद स्मारक। संवाद
औरैया। देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में औरैया की माटी ने शौर्य और बलिदान की इबारत लिखी थी। इस संघर्ष से अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिल गई थी। राजा निरंजन सिंह और खानपुर निवासी रामप्रसाद पाठक ने क्रांतिकारियों का नेतृत्व किया था।उन्होंने औरैया और बेला तहसील से ब्रिटिश गुलामी की जंजीरों को उखाड़ फेंका था। 24 जून 1857 को क्रांतिकारियों ने हमला कर औरैया तहसील पर अपना कब्जा जमा लिया था।
इतिहासकारों के अनुसार, क्रांतिकारियों का गुस्सा यहीं नहीं थमा था। अगले ही दिन 25 जून को बेला तहसील पर जोरदार धावा बोला गया था। अंग्रेजों के वफादार बेला के तहसीलदार को वीरों ने मौके पर ही ढेर कर दिया था। अंग्रेजी शासन का नामोनिशान मिटा दिया गया था। क्षेत्र को पूरी तरह आजाद घोषित करते हुए कुंवर रूप सिंह को यहां का हाकिम नियुक्त किया गया था।
करारी हार से ब्रिटिश हुकूमत बौखला उठी थी। क्षेत्र पर दोबारा कब्जा करने के लिए उन्होंने सेना भेजी थी। 28 नवंबर 1857 को इटावा के तत्कालीन जिलाधिकारी एओ ह्यूम की अगुवाई में यह सेना पहुंची। देवकली मंदिर के पास क्रांतिकारियों और फिरंगी सेना के बीच युद्ध हुआ था।
यह मुठभेड़ 29 नवंबर को हुई थी। इस युद्ध में रामप्रसाद पाठक समेत 17 क्रांतिकारियों ने अपनी मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दी थी। कई अंग्रेज सैनिकों को भी मौत के घाट उतार दिया गया था। भारत प्रेरणा मंच के महासचिव अविनाश अग्निहोत्री ने बताया कि देवकली मंदिर के समीप बना शहीद स्मारक आज भी उन 17 अमर बलिदानियों की शहादत की गवाही देता है। यह स्मारक आज की युवा पीढ़ी के रगों में देशभक्ति का जुनून भरने के लिए एक प्रेरणापुंज बना हुआ है।