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खामोश न रहें, गलत के खिलाफ बुलंद करें आवाज

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उरई। अमर उजाला अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स महाभियान के अंतर्गत शहर स्थित दयानंद वैदिक डिग्री कालेज के सभागार में नारी सशक्तीकरण विषय पर विचार गोष्ठी हुई। जिसमें महिला वक्ताओं ने दो टूक शब्दों में कहा कि नारी को किसी दबाव में रहकर जीवन व्यतीत नहीं करना चाहिए। अपने भीतर के साहस को एकत्र करें और एक समूह बनाकर अपनी आवाज उठाएं। फिर देखिए दुनिया भी नारी की आवाज को न सिर्फ सुनेगी बल्कि उनके अधिकारों को दिलाने की लड़ाई में भी साथ खड़ी नजर आएगी।
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गोष्ठी के दौरान छात्राओं ने भी उत्पीड़न, अधिकारों में कमी के कारण और हर अन्याय पर खामोश रहने संबंधी अपनी जिज्ञासाओं से भरे सवाल वक्ताओं के सामने रखे तो वक्ताओं ने भी उनका बखूबी जवाब देकर न सिर्फ हौसला बढ़ाया बल्कि उन्हें गलत के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रोत्साहित किया। कालेज प्रबंधन की ओर से वक्ताओं को प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित भी किया गया।

कार्यक्रम के दौरान छात्राओं ने खुलकर अपने मन की बातों को गोष्ठी में साझा किया। कहा कि लड़कियों के साथ गलत करने वालों को पुलिस अपनी सुरक्षा में क्यों लेती है, उनके चेहरे क्यो छिपाए जाते हैं। सड़क पर किसी लड़की के साथ गलत होता है तो वह पहले परिवार की मदद ले कि पुलिस की।
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घर पर होने वाले उत्पीडन की आवाज कहां उठाई जाए कि उनका नाम भी न आए और उत्पीडन भी बंद हो जाए। वक्ताओं ने भी उनके हर सवाल का बखूबी जवाब दिया। इस दौरान कालेज के प्राचार्य डॉ. आनंद कुमार खरे, डॉ. माधुरी रावत, डॉ. साम्या बघेल, डॉ. नीता गुप्ता, डॉ. शीलू सेंगर, डॉ. नीति कुशवाह, डॉ. नगमा खानम, डॉ शशि तिवारी और वरिष्ठ पत्रकार अनिल शर्मा आदि मौजूद रहे।

अंग्रेजी की प्रोफेसर डॉ. अलका रानी पुरवार ने कहा कि महिलाएं आज ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है, जहां अपनी मौजूदगी दर्ज न करा रही हों, फिर भी महिलाओं के प्रति संवेदनहीनता कम नहीं हो रही है। इसके लिए हम महिलाओं को चाहिए शिक्षा और साहस की मदद से हम महिलाएं अपराजिता बनकर अपनी आवाज को बुलंद करें। जिससे महिलाओं को उनका अधिकार और सम्मान दोनों ही मिले।

इतिहास विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. मंजू जौहरी ने बताया कि प्राचीन काल से महिलाओं को सम्मान मिलता आ रहा है, इतिहास के पन्ने पलटने पर पता चलता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व बाल विवाह पर प्रतिबंध था, गंधर्व विवाह होते थे। बीच में विदेशियों के भारत पर आक्रमण के बाद महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन शुरू हुआ और उन्हें वस्तु की तरह देखा जाने लगा। अब जरूरत है उस आत्मविश्वास की जो महिलाओं को उनके अधिकार फिर से दिला सके।

प्रख्यात चिकित्सक डॉ. रेनू चंद्रा ने कहा कि समूह के साथ आवाज उठाने के अलावा महिलाओं के विचारों में स्पष्टता जरूरी है। नारी के जीवन में शिक्षा का महत्व इसलिए भी है ताकि वे पढ़ लिखकर न सिर्फ अपने पैरों पर खड़ी हो सकें बल्कि भविष्य में अपने बच्चों को संस्कार और पति को उचित सलाह भी दे सकें। डॉ चंद्रा ने छात्राओं को मीटू अभियान के प्रति भी जागरूक करते हुए उनसे शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की बात कही।

हिंदी विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. नीलम मुकेश ने कहा कि लड़कियों के आकर्षक होने से अधिक महत्वपूर्ण है उनका प्रभावशाली होना। इसके लिए अभिभावकों को चाहिए कि बेटियों की परवरिश पर पूरा ध्यान दें, उनमें और बेटों में कोई फर्क न करें, क्योंकि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बेटियों के ही हाथ में होता है। लिहाजा छात्राओं को चाहिए कि वे अभी से आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करें, जिससे कि बेटियां भी अपनी चमक बिखेर सकें।
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