अमरोहा। जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर आरक्षण की तस्वीर साफ होने से राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। 15 साल बाद सीट फिर से अनारक्षित हो गई है। आरक्षण का लाभ पाकर जिला पंचायत की कुर्सी के लिए दावेदारी करने की सोच रहे दिग्गजों को झटका लगा है। सीट अनारक्षित रहने से दावेदारों की संख्या भी बढ़ सकती है।
जानकारों की मानें तो वर्ष 1997 में पहली बार जिला पंचायत के चुनाव हुए थे। तब अनारक्षित सीट थी। इंद्रावती चुनाव जीतकर जिला पंचायत अध्यक्ष बनीं थीं। इसके बाद वर्ष 2000 में फिर जिला पंचायत का चुनाव हुआ। जिसमें एक बार फिर अनारक्षित सीट होने पर अमरोहा के शिव स्वरूप टंडन जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज हुए थे। वर्ष 2005 में फिर अनारक्षित सीट पर चुनाव हुआ। जिसमें लोक लेखा समिति के सभापति एवं विधायक महबूब अली की पत्नी सकीना बेगम जिला पंचायत की कुर्सी पर काबिज हुई। वर्ष 2010 में पहली बार सीट अनुसूचित महिला के लिए आरक्षित हो गई। तब हसनपुर निवासी एवं बहुजन समाज पार्टी के पूर्व जिला अध्यक्ष हेम सिंह आर्य की पत्नी कमलेश आर्य जिला पंचायत की अध्यक्ष बनीं। इसके बाद वर्ष 2015 में सीट पिछड़ा वर्ग महिला के लिए आरक्षित की गई। सीट पर पूर्व कैबिनेट मंत्री रहे स्वर्गीय चौधरी चंद्रपाल सिंह की पुत्रवधू रेनू चौधरी समाजवादी पार्टी से जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज हुई। लेकिन जिले की सियासत ने उन्हें पूरे 5 साल तक अध्यक्ष की कुर्सी पर संभालने नहीं दिया। वर्ष 2017 में विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद जिले की जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर खतरा मंडराने लगा था। अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। वर्ष 2018 में जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी का तख्तापलट करते हुए भाजपा की सरिता चौधरी जिला पंचायत अध्यक्ष बनीं। अब फिर जिला पंचायत चुनाव होने है। इस बार शासन द्वारा अमरोहा जिला पंचायत अध्यक्ष अनारक्षित सीट तय की गई है। अनारक्षित सीट होने से जिले में जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज होने की तैयारी करने वाले दिग्गजों के सामने मुश्किल पैदा हो गई है।