लू से बचने के लिए मुंह से कपड़ा लपेटकर जाता बाइक सवार।
- फोटो : amar ujala
पिछले कई सालों से बारिश का असामान्य स्थिति और तापमान में वृद्धि के कारण क्षेत्र में भूमिगत जलस्तर में गिरावट आई है। क्षेत्र में सिंचाई का संकट गहराने लगा है। कहीं जलस्तर 30 से 35 फीट पर था, जो घटकर 45-50 फीट पहुंच गया है। कुछ स्थानों पर 60 फीट पर जलस्तर पहुंच गया है।
इसके कारण उथले बोरिंग फेल हो रहे हैं। वहीं 150 से 180 फीट की गहराई वाले बोरिंगों की जलधारा सिकड़ने लगी है। हैंडपंपों के हलक सूखने लगे हैं। भूमिगत जलस्तर में आई गिरावट के कारण धरती की प्यास बढ़ती जा रही है। खेतों से नमी खत्म होती जा रही है। एक बीघा भूमि की सिंचाई करने में दो से ढाई घंटे का समय लगता है।
इससे किसानों पर आर्थिक मार पड़ी रही है। लोगों का कहना है कि अगर तेजी से घटते जलस्तर को नहीं रोका गया, तो वो दिन दूर नहीं जब अमरोहा में भी बुंदेलखंड जैसे हालात बन जाएंगे। लोग पानी की एक-एक बूंद को तरस जाएंगे। भूमिगत जलस्तर में आई गिरावट के लिए कहीं हद तक हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं।
क्षेत्र में सोत नदी सूख चुकी हैं। बान नदी भी सूखने की कगार पर है। इन नदियों के सूखने के कारण भी क्षेत्र का जलस्तर तेजी से गिरा है। जो तालाब थे, वे पाटे जा रहे हैं। काफी तालाबों का अस्तित्व खत्म हो चुका है। जल संचय को लेकर अफसर व जनसामान्य भी गंभीर नहीं है। तालाबों को पानी से नहीं भरा जाता है।
साल भर तालाब सूखे रहते हैं। बारिश के पानी का संचय नहीं हो रहा है। नाले, नालियों में बरसात का पानी बह जाता है। दूसरा प्रमुख कारण पिछले कई साल से क्षेत्र में औसत से कम बारिश होना है।
जिले में भूमिगत जलस्तर का दोहन अधिक हो रहा है और रिचार्ज का प्रतिशत कम है। इन सबके चलते जिले में छह ब्लाक में एक ब्लाक ही सेफ जोन में है, बाकी क्रिटिकल जोन में शामिल हैं। बोरिंग पर प्रतिबंध हैं।