जिला अस्पताल की एक घटना ने सोमवार को मानवता को शर्मसार कर रख दिया। संवेदनहीनता की ये हद तब देखने को मिली जब टीबी से पीड़ित युवक करीब तीन घंटे तक अस्पताल की बेंच पर पड़ा हुआ कराहता रहा। मां डाक्टरों को बुलाने के लिए इधर-उधर अस्पताल में भटकते रही।
रो-रोकर गुहार लगाती रही, लेकिन धरती पर भगवान का रूप डाक्टरों ने भर्ती करना तो दूर उसे देखना भी मुनासिब नहीं समझा। परिजनों की हालत देख वहां मौजूद अन्य मरीजों को रोना आ गया, लेकिन डाक्टरों का दिल नहीं पसीजा।
जिंदगी और मौत से लड़ते हुए पीड़ित ने अस्पताल के बेंच पर ही दम तोड़ दिया। मौत के बाद परिजन का रुदन शुरू हुआ तो डाक्टर तमाशा देखने पहुंच गए। परिजनों का आरोप है कि यदि पीड़ित को समय से उपचार मिल जाता तो शायद उसकी जान बच जाती।
डाक्टरों को धरती पर भगवान का रूप दिया जाता है। लोगों को अंदर विश्वास होता है कि वो मुर्दे भी जान फूंक सकते हैं। इसी विश्वास को लेकर वो अस्पताल पहुंचते हैं। लेकिन सोमवार को जो जिला अस्पताल में वो मानवता को शर्मसार करने वाला था। रजबपुर थाना क्षेत्र के गांव हैबतपुर निवासी मो. कासिफ (20) पुत्र रियासत पिछले काफी समय से टीबी रोग से पीड़ित था। जोया के सरकारी अस्पताल में उसका इलाज चल था। सोमवार को परिजन उसे गंभीर हालत में लेकर जिला अस्पताल लेकर पहुंचे।
परिजनों ने बताया कि सुबह आठ बजे अस्पताल में पहुंच गए थे, चिकित्सक को दिखाया। चिकित्सक ने बलगम की जांच कराने के बाद मरीज को भर्ती करने की बात कही। यहीं से शुरू हुआ संवेदना को झकझोरने का खेल। आरोप है कि अस्पताल कर्मियों ने न तो बलगम की जांच की, नहीं ही भर्ती किया। तीन घंटे तक मरीज अस्पताल की बेंच पर कराहता रहा।
मरीज की मां उसे भर्ती कराने के लिए डाक्टरों के आगे पीछे घूमती रही। गुहार लगाती रही, लेकिन किसी की दिल नहीं पसीजा। मां और पीड़ित की हालत देखकर अन्य मरीजों और उनके परिजनों की आंखों में आंसू आ गए, लेकिन मरीज को भर्ती करने के लिए कोई आगे नहीं आया। मौत से लड़ते लड़ते कासिफ हार गया और ओपीडी की बेंच पर ही दम तोड़ा दिया।
मां के मुंह से चीत्कार निकल पड़ी। बेंच के आसपास भीड़ लग गई। शोर शराबा सुनकर डाक्टर भी वहां पहुंच गए। नब्ज देखी और उसे मृत घोषित कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। मृतक का पीएम कराने की बात कहीं, लेकिन परिजन पीएम कराने को तैयार नहीं हुए। बगैर पीएम कराए ही एंबुलेंस से युवक के शव को लेकर घर ले आए।