अमरोहा। वाकिफ कहां था जमाना हमारी उड़ान से, जो हार गए आसमान से। लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं, मैंने उसे हाल में जीने की कसम खाई है। किसी शायर की ये पंक्तियां उन लोगों के लिए प्रेरणा हैं जो जो मुश्किल की घड़ी में हिम्मत हार देते हैं और जिंदगी उन्हें बोझ लगने लगती है। यूं तो जिंदगी में बहुत कुछ खोकर कामयाबी को छूना आसान नहीं हैं। लेकिन इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास के बल पर सफलता पाई जा सकती है। अमरोहा की मिट्टी ने भी अपने दामन में ऐसी ही हस्तियों को सींचा है। जिन्होंने दिव्यांगता के बावजूद भी अपना मुकाम पाया है।
दोनों हाथ खोए, लेकिन कम नहीं हुआ जुनून
हसनपुर। गांव रजोहा निवासी किसान जयपाल सिंह की बेटी रेखा चौहान की कहानी लोगों का हौसला बढ़ाती है। करीब छह वर्ष की उम्र में घर पर ही चारा मशीन में आकर दोनों हाथ कोहनी तक हाथ कट गए थे। भाई-बहनों एवं दूसरों बच्चों को स्कूल जाते देख रेखा ने भी पढ़ने की इच्छा जताई। कई लोगों ने तर्क दिया कि वह कैसे लिख पाएगी, लेकिन परिवार ने उसका साथ नहीं छोड़ा। परिवार वालों ने गांव के ही प्राथमिक स्कूल में उसका दाखिला करा दिया। शुरुआत में रेखा को स्कूल आने जाने में काफी परेशानी हुई। हाथ न होने की वजह से रेखा ने पैर से लिखने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिल पाई, फिर भी हार नहीं मानी। इस बार रेखा ने मुंह में कलम दबा ली। कुछ ही दिन बाद वह लिखना सीख गई। उन्होंने रेखा को आगे पढ़ने में पूरी मदद की। वर्ष 2006 में हाईस्कूल एवं वर्ष 2008 में कक्षा 12 की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उसने कोराल डिग्री कॉलेज से बीए की डिग्री हासिल की। फिर लखनऊ की डॉ. शकुंतला यूनिवर्सिटी से वर्ष 2016 में बीएड किया। रेखा का का शिक्षिका बनने का सपना है।
-
जुनून के आगे हारी दिव्यांगता
अमरोहा। देहात थाना क्षेत्र के ग्राम हसनपुर कचिया निवासी भोपाल सिंह सैनी पुत्र डूंगर सिंह सैनी बचपन से ही दोनों पैराें से दिव्यांग हैं। वह बैसाखियों के सहारे चलते हैं। पारिवारिक परिस्थितियां विपरीत होने के चलते वह अधिक पढ़ाई तो नहीं कर सके, लेकिन उन पर परिवार की जिम्मेदारियों को बोझ था। जिसे उन्होंने अपनी दिव्यांगता के आड़े नहीं आने दिया। उन्होंने कपड़ा सिलाई से काम की शुरुआत की। उसके बाद उन्होंने कॉस्मेटिक की दुकान भी की। लेकिन, उन्हें गायकी का शौक था। इसके लिए उन्होंने 20 वर्ष पूर्व जागरण में गाने की शुरुआत की। इससे उन्हें क्षेत्र में अलग पहचान मिली और वह आगे बढ़ते चले गए। उन्होंने बताया कि उनकी जागरण पार्टी ने दूर-दराज के क्षेत्र धार्मिक आयोजन करती है। जिसमें वह बैसाखी के सहारे भजन गायकी से लोगों के दिलों में अपनी जगह बना रहे हैं। उनकी शादी हो चुकी है और उनके बेटा-बेटी है।
-
हौसलों की उड़ान से नेत्रहीन जितेंद्र ने बनाई पहचान
गजरौला। गजरौला स्थित पंजाब नेशनल बैंक की शाखा में तैनात जितेंद्र सिंह बचपन से ही नेत्रहीन हैं। उनके पिता ओमप्रकाश सिंह स्वास्थ्य विभाग में तैनात थे। अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। बेटे के नेत्रहीन होने के चलते माता-पिता उनके भविष्य को लेकर परेशान हुए। लेकिन, उन्होंने खुद को मजबूत बनाते हुए बेटे को किसी मुकाम तक पहुंचाने की ठान ली। इसके लिए उनकी मां शिक्षावती ढाल बन गईं। उनका दाखिला देहरादून राष्ट्रीय दृष्टि बाधित संस्थान में कराया गया। इस दौरान उन्होंने जूनियर एसोसिएट ऑफ द इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बैंक की परीक्षा पास की। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी बैंक में नौकरी लग गई। उन्होंने कंप्यूटर की की बोर्ड और खुद की मेहनत से बैंकिंग सेक्टर में अपनी अलग पहचान बनाई। वह अब तक 52 से अधिक शाखाओं में तैनात रह चुके हैं। जितेंद्र बहुत तेज दिमाग के हैं। जिसकी बदौलत वह बैंक की लोन की डूबी चुकी रकम को वापस दिला चुके हैं।
गलत इंजेक्शन से खराब हुए पैर, लेकिन कम नहीं हुआ जज्बा
अमरोहा। नगर के मोहल्ला मोहम्मदी सराय निवासी मोहम्मद आबिद की चार वर्ष की उम्र में तबीयत खराब हुई। चिकित्सक द्वारा गलत इंजेक्शन लगाए जाने पर उनके पैरों ने काम करना बंद कर दिया। एक टांग पूरी तरह बेकार हो गई। जिसके बाद परिवार के लोग उनके भविष्य को लेकर चिंतित रहने लगे। लेकिन, आबिद जैसे-जैसे बड़े होते गए, उनकी हिम्मत बढ़ती चली गई। उन्होंने हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपना व्यापार शुरू किया। उन्होंने मोबाइल शॉप से व्यापार की शुरुआत की। उसकी जरिए उन्होंने अपना नाम रोशन किया है।
-