किसी समय में गांवों की जीवन रेखा माने जाने वाले तालाबों को अब किसी ‘भगीरथ’ का इंतजार है। कभी पानी से लबालब रहने वाले तालाबों में बूंद भर भी पानी नहीं बचा। इससे जहां ग्रामीण क्षेत्र का भूजल स्तर गिरता जा रहा है। मवेशियों को भी पीने के पानी के लाले पड़ने लगे हैं। कहीं तालाबों में उपले पाथे जा रहे तो कहीं उसमें पौधे रोपे जा रहे। कहीं तालाबों को गैर-जरूरी मानकर समेटा जा रहा है तो कहीं दबंगों का कब्जा हो रहा है। फिलहाल तालाबों के संरक्षण की पहल नहीं है।
गांव मानकजूड़ी के अस्सी वर्षीय फूल सिंह ने जबसे होश संभाला तबसे अपने गांव के तालाब को देखा है। शुरू में इस तालाब का दायरा बहुत बड़ा था। पानी इतना साफ था कि इसका पानी गांव वाले पीते थे। बीते डेढ़ दशकों में स्थिति बदल चुकी है। अब इसमें बरसात के दिनों में तो कुछ पानी भरता है।
गर्मी शुरू होते ही तालाब सूख जाता है। जोया ब्लाक के गांव जमापुर के तालाब की हालत तो यह है कि ग्राम पंचायत ने पानी भरने के बजाय तालाब में ही पेड़-पौधे ही उगा दिए हैं। अतरासी खुर्द के तालाब को उपले पाथने के काम में लिया जा रहा है। देवीपुरा गांव में दो तालाब है। एक सूख चुका है, जबकि दूूसरे पर कब्जा हो चुका था।
दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 2005 में केंद्र सरकार ने जलाशयों की मरम्मत, नवीनीकरण और जीर्णोद्धार (आरआरआर) के लिए योजना बनाई। ग्यारहवीं योजना में काम शुरू भी हो गया, योजना के अनुसार राज्य सरकारों को योजना को अमली जामा पहनाना था। इसके लिए कुछ धन केंद्र सरकार की तरफ से और कुछ विश्व बैंक जैसी संस्थाओं से मिलना था। इस योजना के तहत इन जलाशयों की क्षमता बढ़ाना, सामुदायिक स्तर पर बुनियादी ढांचे का विकास करना था।
गांव, ब्लाक, जिला व राज्य स्तर पर योजना को लागू किया गया है। धरातल पर हालात कुछ और ही बयां कर रहे हैं।दरअसल तालाबों पर कब्जा करना इसलिए आसान है कि तालाब अलग-अलग महकमों के पास हैं- राजस्व विभाग, वन विभाग, पंचायत, मछली पालन, सिंचाई, स्थानीय निकाय, पर्यटन शायद और भी बहुत कुछ हों। कहने की जरूरत नहीं कि तालाबों को हड़पने की प्रक्रिया में स्थानीय असरदार लोगों और सरकारी कर्मचारियों की भूमिका होती ही है।