जररला में रेलवे स्टेशन के बाहर दीवार पर बैठे कौए।
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गजरौला। पितृपक्ष श्राद्ध चल रहे हैं। इन दिनों कौए का विशेष महत्व है। श्राद्ध की थाली निकालकर इन्हें भोजन कराने के लिए लोगों को कौए ढूंढने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। विरले लोगों को ही इनके दर्शन हो पा रहे हैं। नहीं मिलने पर लोग छतों पर भोजन रखकर औपचारिकता निभा रहे हैं।
भारतीय मान्यता के अनुसार मृत्युपरांत इंसान पहला जन्म कौए के रूप में ही लेता है। मान्यता है कि कौए को पहला ग्रास (भोजन) खिलाने से वह पितृों को मिलता है। यही वजह है कि पितृपक्ष श्राद्ध में कौए का महत्व बढ़ जाता है। एक जमाना था कि घरों की छतों और मुंडेरी पर कौए खूब कांव-कांव किया करते थे। यदि कौए अधिक संख्या में किसी घर में छत पर बैठकर कांव-कांव करते थे तो आभास लगाया जाता था कि कोई मेहमान अवश्य आएगा। ऐसा होता भी था। अब कौए की कांव-कांव कम ही सुनाई पड़ती है। इतना ही नहीं इनकी संख्या भी अब काफी कम हो चली है। यही वजह है कि श्राद्ध के दिनों में इनकी काफी ढूंढभाल होती है। गंगाधाम तिगरी के पंडित गंगाशरण शर्मा ने बताया कि त्रेतायुग में जयंत ने कौए का रूप धारण किया और वनवास के दौरान रसोई में भोजन पका रहीं माता सीता के पैर में चोंच मार दी थी। इससे गुस्साए प्रभु श्री राम ने तिनके का बाण चलाकर उसकी एक आंख फोड़ दी थी। आम दिनों में यदि कौए छत पर आकर कांव-कांव करें तो उनकी आवाज लोगों का काफी चुभती है लेकिन श्राद्ध के दिनों में तो लोग कौए के दर्शन तक को तरस जाते हैं। इनके लिए पूरी, सब्जी, खीर आदि निकालते हैं और फिर उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित करते हैं। औद्योगिक नगरी में रेलवे स्टेशन, बस्ती स्थित चामुंडा मंदिर के आसपास कौओं को भोजन खिलाने के लिए लोग उनकी तलाश में रहते हैं। नसीबवालों को ही इन दिनों कौओं के दर्शन हो रहे हैं।