फिरकापरस्ती, बुतपरस्ती जैसे मसलों से दूर गंगा-जमुनी तहजीब की जीती-जागती मिसाल देखनी हो तो नौगावां सादात चले आइए। रहीम के बंदे यहां प्रभु राम की लीला की समूची व्यवस्था देखते हैं। 43 साल पहले शुरू हुआ यह सिलसिला आज भी बदस्तूर कायम है। रामलीला कमेटी के अध्यक्ष गुलाम अब्बास हैं। उनके चाचा ने 1973 में यह शुरुआत की थी। मुहर्रम का भी ख्याल है, लिहाजा इस साल रामलीला 17 सितंबर से शुरू होगी।
जिला मुख्यालय से 16 किलोमीटर दूर स्थित नौगावां सादात बीड़ी उद्योग और कपड़ा व्यापार के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है। लेकिन एक और वजह इसे मशहूर बनाए हुए है। दरअसल कस्बे में हर साल मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की लीला का मंचन होता है। मौजूदा चार साल से प्रोजेक्टर के जरिए पर्दे पर रामलीला होती है, मगर इससे पूर्व कलाकार ही रामलीला का मंचन करते थे।
जिसका सारा दारोमदार रामलीला कमेटी के कंधों पर है। गौर करने वाली बात यह है कि रामलीला कमेटी की कमान मुसलिमों के हाथों में हैं। 43 साल से मुसलिम ही कमेटी की डोर हाथों में थामे हैं और यह रस्म निभती चली आ रही है। रामलीला के मंचन से लेकर रावण के पुतला दहन की सारी जिम्मेदारी यह पूरी शिद्दत से अदा करते आ रहे है। करीब 12 दिन तक होने वाली रामलीला पर 50 हजार रुपये खर्च आता है। जिसके लिए हिंदू और मुसलिम दोनों से चंदा किया जाता है।
43 साल से इस परंपरा को निभते देखते आ रहा हूं। इससे समाज में हिंदू-मुसलिम एकता का संदेश जा रहा है।
गुलाम अब्बास, प्रबंधक, रामलीला कमेटी