गांव रझोहा निवासी रेखा की जिंदगी उसके संघर्ष और सफलता की कहानी बयां करती हैं। दिव्यांग होने के बाद जीवन की कठिनाईयों में तपकर, मन की इच्छाओं को कुर्बान कर उसने जो कामयाबी हासिल की है, वह वाकई काबिल ए तारीफ है और दूसरों के लिए आइना भी।
बचपन में दोनों हाथ गवांने के बाद भी उसने हिम्मत नहीं हारी। हौसले के बूते अलग पहचान बनाई। पैरों से जब लिखना नहीं आया तो मुंह व कटे हाथों को हथियार बनाया। हाईस्कूल से लेकर एमए, बीएड तक की पढ़ाई की। उसका यह हौसला देख अफसर भी हैरान हैं। दूसरों के लिए मिसाल बनी रेखा का नाम जिला विकलांग जन विकास विभाग ने राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया और मंजूरी के लिए शासन को भेजा है।
हसनपुर तहसील क्षेत्र के गांव रझोहा निवासी किसान जयपाल सिंह के तीन बेटे व दो बेटियां हैं। इनमें रेखा सबसे छोटी है। करीब छह साल की उम्र में चारा काटने की मशीन से उसके दोनों हाथ कोहनी के पास से कट गए थे, जिस पर परिवार के लोग बेचैन थे।
रिश्तेदार भी उसकी जिंदगी के बारे में सोचकर तरह-तरह की राय परिवार दे रहे थे, लेकिन मां समंत्रा देवी व पिता ने किसी की नहीं सुनी। बेटी की परवरिश का फैसला लिया। स्कूल जाते बच्चों को देख रेखा के मन में भी पढ़ने का जज्बा पैदा हुआ। चूंकि हाथों के कटने से मायूस थी, किंतु उसने जज्बे को मरने नहीं दिया।
परिवार से कापी किताब मंगवाईं और पैरों से कलम चलाना सीखने लगी, लेकिन असफलता हाथ लगी। हिम्मत से काम लेते हुए उसने मुंह में कलम दबाकर लिखाई चालू की। कलम संभालने के लिए हाथों का सहारा लिया। धीरे-धीरे ऐसा अभ्यास बना कि कामयाबी की इबारत लिखती चली गई। हाईस्कूल, इंटर, बीए और फिर एमए पास कर लिया।
इसके बाद लखनऊ से बीएड की पढ़ाई भी पूरी कर ली। हालांकि शिक्षा पाने के दौरान उसको तमाम चुनौतियों से गुजरना पड़ा। लोगों का उपहास भी बनी, किन्तु जरा भी मार्ग से विचलित नहीं हुई। उसके इस साहस को देखकर अफसर भी अचरज में पड़ गए। जिला विकलांग जन विकास विभाग ने उसका नाम राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए भेजा है। बाकायदा जिलाधिकारी ने उसके नाम की संस्तुति की है।