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खत्म हुआ इंतजार, पैंटून पुल है तैयार

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चकनवाला में रामगंगा पोषक नहर पर पैंटून पुल तैयार करते श्रमिक। - फोटो : GAJRAULA
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गजरौला (अमरोहा)। लगभग छह माह के लंबे इंतजार और दुष्वारियां झेलने के बाद खादर में गंगा के पार बसे 18 से अधिक गांवों के हजारों ग्रामीणों की परेशानी अब खत्म होने की कगार पर है। चकनवाला में रामगंगा पोषक नहर पर हटाया गया पैंटून पुल फिर से तैयार कर लिया गया है और इसे रविवार को आवागमन के लिए खोल दिया जाएगा।
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शनिवार को सिंचाई विभाग के जेई वीर सिंह और मेट कल्लू सिंह की देखरेख में श्रमिकों की टीम चकनवाला में गुजर रही राम गंगा पोषक नहर पर पैंटून पुल को बांधती नजर आई। यहां लोहे के दस विशाल पीपे रखे गए हैं। जो कि 20-20 फीट की दूरी पर लोहे की इंगट से वेल्ड किए हुए हैं। यानी पैंटून पुल दो सौ फीट लंबाई है। इस पर शीशम के पेड़ की टहनियां रखकर उन्हें बांधने के बाद ऊपर से पुआल और फिर मिट्टी डाली गई है। जेई ने बताया कि यह पुल रविवार की सुबह आवागमन के लिए खोल दिया जाएगा।
बता दें कि खादर में स्थित गांव चकनवाला में गुजर रही रामगंगा पोषक नहर के पार जाटोवाली, शीशोवाली, टीकोवाली, ढाकोवाली, सुल्तानपुर, रामपुर खादर, बिसावली, दारानगर, भुड्डीवाली, मीरापुर, लंगड़ेवाली, देववाली, मदिर वाली भुड्डी समेत 18 से अधिक गांव स्थित हैं। इन गांवों में जाने का एकमात्र साधन यहां रामगंगा पोषक नहर पर लगा पैंटून पुल होता है। हर वर्ष बरसात के सीजन में 15 जून के बाद इसे वहां से हटा लिया जाता है। इस दौरान गंगा उफान पर रहती है और पुल के बह जाने का खतरा हो जाता है। वहीं पुल के हटने के बाद गंगा पार बसी हजारों की आबादी नाव, डोंगी और ट्यूब के सहारा उफनाती गंगा में जान हथेली पर रखकर सफर करते हैं। अब पुल के अस्तित्व में आने के बाद उन्हें परेशानी से राहत मिलना तय है।
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देखरेख हो तो न टूटे पुल
गजरौला। सिंचाई विभाग के जेई वीर सिंह ने बताया कि विभाग इस पैंटून पुल को काफी मजबूती से बनवाता है, लेकिन देखरेख के अभाव में यह पुल कुछ माह बाद ही क्षतिग्रस्त हो जाता है। कारण, ग्रामीण इस पैंटून पुल पर ओवरलोडेड ट्रैक्टर-ट्रालियां लेकर गुजरते हैं। इससे यह पुल जगह-जगह से उखड़कर कमजोर हो जाता है। उन्होंने बताया कि यदि इस पुल पर इस तरह के वाहन नहीं गुजरें तो इस पुल की सड़क आसानी से नहीं उखड़ पाएगी।
नाव में रखकर लाते हैं बाइक
गजरौला। खादर में गंगा के पार स्थित 18 गांवों के ग्रामीणों की जिंदगी काफी परेशानी के बीच बीतती है। कारण गांव में आने का कोई अन्य संसाधन नहीं है। गंगा के पार रहने वाले ग्रामीण जब भी किसी काम से गजरौला की ओर आते हैं या फिर यहां से गांवों में जाते हैं तो अपनी बाइक नाव में रखकर ले जाते हैं। एक नाव में दस से बारह तक बाइक आ जाती हैं। हादसे की आशंका भी बनी रहती है, लेकिन करें क्या। ऐसा करना उनकी विवशता है। जो कि अब खत्म हो जाएगी।
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