अमरोहा। अग्निकांड की कई बड़ी घटनाओं के बावजूद जिम्मेदार गंभीर नहीं है। अमरोहा के सरकारी समेत अधिकांश निजी अस्पतालों में आग बुझाने के मुकम्मल इंतजाम नहीं है। अग्निशमन यंत्र और पाइपलाइन खराब पड़ी हैं। अलार्म भी नहीं बजते हैं। आग बुझाने के पुख्ता इंतजाम नहीं है, यदि आग लगने की घटनाएं होती है तो सिर्फ काबू पाने के लिए फायर सिलिंडर ही बचाव के एकमात्र उपाय होंगे। कई अस्पतालों में इंतजाम तो हैं लेकिन ठीक से रखरखाव नहीं होने से अग्निशमन संयंत्र खराब हो चुके हैं। दमकल विभाग के नोटिस के बाद भी स्वास्थ्य महकमा सुध नहीं ले रहा है।
बीती रविवार रात जयपुर में अस्पताल में आग लगने से छह लोगों की मौत हो गई थी। इससे पहले पिछले वर्ष नवंबर महीने में झांसी के अस्पताल में अग्निकांड के बाद आग से बचाव को लेकर फायर ब्रिगेड ने अभियान शुरू कर व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के निर्देश दिए गए थे।
जिला अस्पताल समेत अन्य जगह आग से बचाव और राहत की व्यवस्था सिर्फ कागजों तक सीमित है। कभी अस्पताल में आग लगने जैसी घटना हुई, तो राजस्थान जैसी घटना की पुनरावृत्ति होने से इन्कार नहीं किया जा सकता। अगर चिंगारी भड़की तो अस्पतालों में मरीजों की जान बचाना मुश्किल होगा। मालूम रहे जिले में जिला अस्पताल व सीएचसी समेत 500 से अधिक निजी नर्सिंग होम और अस्पताल हैं।
अग्निशमन यंत्रों के पास से बालू रेत की बाल्टी भी गायब
जिला अस्पताल में ही रोजाना एक हजार से 1200 से 1500 मरीज और उनके तीमारदार आते हैं। जिला अस्पताल में आग बुझाने के लिए पानी टैंक, फायर सिलेंडर, अलार्म जैसी सुविधाएं हैं लेकिन पुरानी बिल्डिंग में कहीं पाइप नहीं है तो कहीं फायर सिलिंडर को पकड़ने का जुगाड़। अस्पताल की तीन मंजिला बिल्डिंग में भी आग लगी जैसी घटना से निपटने का कोई खास इंतजाम नहीं है। जिला अस्पताल घुसते ही एक्सरे कक्ष की तरफ जाते समय अग्निशमन यंत्र के पाइप खिड़की पर रखे मिले। ओपीडी, डायलिसिस के पास की तरफ फायर हाइड्रेंट शिस्टम का पाइप ही गायब था। अग्निशमन यंत्रों के पास से बालू रेत की बाल्टी भी गायब हैं।
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जिले में 500 से ज्यादा बड़े अस्पताल, फायर ब्रिगेड की एनओसी सिर्फ 130 पर
जिले में 500 से ज्यादा बड़े अस्पताल चल रहे हैं इनमें मरीजों को भर्ती कराया जाता है लेकिन 130 नर्सिंग होम और अस्पतालों को छोड़कर किसी के पास फायर ब्रिगेड की एनओसी नहीं है। पानी की व्यवस्था तो दूर कई अस्पताल ऐसे हैं जहां अग्निशमन की गाड़ी भी नहीं पहुंच सकतीं।
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बेसमेंट बना रखे हैं वार्ड, निकासी के लिए एक ही द्वार
अस्पताल समेत किसी भी बड़े भवन के लिए नियम यह है कि वहां कम से कम दो निकास द्वार हों ताकि आपात स्थिति में एक द्वार से लोग बाहर निकलते रहें और दूसरे से राहत कार्य जारी रहे। इस नियम का भी यहां कई अस्पतालों में पालन नहीं हो रहा है। कुछ अस्पतालों में दो रास्ते ही नहीं हैं। वाहनों की पार्किंग के लिए बनाए गए बेसमेंट भी वार्ड बनाकर मरीजों को भर्ती किया जा रहा है।
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ये हैं अस्पतालों के लिए अग्नि सुरक्षा के मानक
- न्यूनतम डेढ़-डेढ़ मीटर चौड़े दो दरवाजे होने चाहिए।
- ऊपरी मंजिल पर ओवरहेड टैंक हो जिसमें हमेशा पानी भरा रहे।
- प्रत्येक मंजिल पर होज रील का इंतजाम हो।
- जगह-जगह अग्निशमन यंत्र लगे हों।
- आपातकालीन संकेतक और फायर अलार्म हो।
- बेसमेंट में अस्पताल का संचालन न हो।
- अग्निशमन विभाग की एनओसी ली हो।
- अग्निशमन विभाग, पुलिस और आपातकालीन नंबरों का डिस्प्ले हो।
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अस्पतालों में अग्निसुरक्षा के मानक तय हैं। जिले में करीब 130 अस्पतालों पर एनओसी है जो अस्पताल या नर्सिंग होम बिना एनओसी के संचालित हो रहे हैं उन्हें नोटिस भी भेजी जाती है। उन पर कार्रवाई का अधिकार स्वास्थ्य विभाग को है। जल्द ही फिर से अस्पतालों का निरीक्षण किया जाएगा। मानक पूरा नहीं करने वालों को नोटिस देकर कार्रवाई की जाएगी। - अनिल कुमार सिंह, मुख्य अग्निशमन अधिकारी