महाराष्ट्र की आयुर्वेदिक कंपनियों से बड़े पैमाने पर करैला के आर्डर मिले हैं। कंपनियां डायबिटीज बीमारी में यहां के करेले का इस्तेमाल कर रही हैं। रोजाना करीब ढाई सौ क्विंटल करेला अमरोहा से महाराष्ट्र जा रहा है। अचानक डिमांड बढ़ने से जिले में करैला के दाम में उछाल आ गया है।
अमरोहा जिले में करीब चार सौ एकड़ जमीन पर इस बार करैला सब्जी की पैदावार हुई है। सर्वाधिक करैला बरसाती वैरायटी का उगाया गया है। क्योंकि देखने में यह करैला एक दम हरा होता है और डायबिटीज बीमारी से लड़ने में देसी के बजाय ज्यादा कारगर है।
यही कारण है कि पिछले तीन वर्षों में महाराष्ट्र की आयुर्वेदिक कंपनियों का ध्यान अमरोहा के करैला की तरफ आकर्षित हुआ है। इस बार कंपनियों से बड़े पैमाने पर आर्डर मिले हैं। अमरोहा से रोजाना ढाई सौ क्विंटल करैला रोजाना महाराष्ट्र भेजा जा रहा है। करैले की डिमांड बढ़ने से इसके दामों में भी उछाल आया है।
सीजन में कभी चार-पांच रुपये प्रति किलो में बिकने वाला करैला इस बार 17-18 रुपये के हिसाब से सीधे सब्जी उत्पादकों से खरीदा जा रहा है। ट्रांसपोर्ट खर्च और व्यापारियों के कमीशन के कारण कंपनियों को यही करैला 24-25 रुपये प्रति किलो के हिसाब से सप्लाई हो रहा है।
बरसाती करैला की सबसे ज्यादा पैदावार
अमरोहा। करैला दो तरह का होता है। एक करैला थोड़ा छोटा और मोटा होता है। इसे देसी वैरायटी कहा जाता है। लेकिन यह ज्यादा समय नहीं टिक पाता और पीला पड़ने लगता है। अधिकांश पैदावार देसी करैला की ही होती है। इसकी सब्जी कुछ ज्यादा ही लजीज होती है। दूसरे तरह का करैला लंबा और गहरे हरे रंग का होता है।
इसे बरसाती करैला कहते हैं और यह जल्दी खराब नहीं होता है। देखने में सख्त लगने वाला यह करैला जरूरत से ज्यादा कड़वा भी होता है। लिहाजा डायबिटीज से निपटने में बरसाती करैला को ज्यादा कारगर माना गया है। लिहाजा इस बार जिले में बरसाती करैला की बंपर पैदावार हुई है।
सब्जी उत्पादकों के चेहरों पर लौटी मुस्कान
अमरोहा। पिछले वर्ष बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने सिर्फ गन्ना और गेहूं किसानों को ही बर्बाद नहीं किया था बल्कि सब्जी उत्पादक भी बर्बादी की कगार पर आ गए थे। सब्जी की सभी फसले चौपट हो गईं थीं, लेकिन इस बार बरसाती करैला की बंपर पैदावार और महंगे दाम मिलने से सब्जी उत्पादकों के चेहरों पर मुस्कान लौट आई है।
बेमौसम बारिश से फसल को खतरा
अमरोहा। आढ़ती सर्वेश सैनी कहते हैं, सब्जी की पौध काफी नाजुक होती है। ज्यादा पानी फसल को नष्ट कर देता है। यदि मौसम ने बेरूखी दिखाई, तो करैला समेत कई तरह की घरेलू सब्जियों पर संकट खड़ा हो सकता है।
क्या कहते हैं सब्जी उत्पादक
-आढ़ती सर्वेश सैनी कहते हैं, खाने के साथ-साथ करेला दवाई बनाने के काम में भी लिया जा रहा है। पिछले तीन साल से अमरोहा का करेला महाराष्ट्र जा रहा है। इस बार बड़े पैमाने पर करेला मांगा गया है। रोजाना करीब चार लाख रुपये का करेला अमरोहा से बाहर जा रहा है।
-सब्जी उत्पादक सुरेश सैनी कहते हैं, इस बार सब्जी उत्पादक खुद को आर्थिक रूप से मजबूत महसूस कर रहे हैं। करैला की पैदावार करने वाले उत्पादक काफी खुश हैं। क्योंकि मनमाफिक दाम पर उनका करैला बिक रहा है।