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बेटियां घर में की गईं नजरबंद

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गजरौला (अमरोहा)। रिटायर्ड कानूनगो दयाराम सिंह हत्याकांड में तीसरे दिन भी पुलिस के हाथ खाली हैं। पुलिस का भी यह मानना था कि हत्या का राज उनके ही परिवार में कैद है। दयाराम के घर वालों ने हत्या का राज के साथ ही साक्ष्य भी छुपाने-मिटाने की पूरी कोशिश की। पड़ोसियों के साथ ही पुलिस से भी गलतबयानी की लेकिन इसके बाद भी पुलिस का ढीला रवैया कई सवाल खड़े कर रहा है। पुलिस ने दयाराम के गांव लखमिया स्थित आवास पर 24 घंटे का पहरा बैठाया है। परिवार के किसी सदस्य को किसी भी शख्स से मिलने अथवा बातचीत करने पर पाबंदी है।
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सोमवार की शाम लगभग साढ़े छह बजे अमर उजाला की टीम थाना बछरायूं के गांव लखमिया स्थित रिटायर्ड कानूनगो दयाराम सिंह के आवास पर पहुंची। यहां गजरौला थाने की एक महिला पुलिसकर्मी समेत तीन सशस्त्र पुलिसकर्मी तैनात मिले। घर के दरवाजे के सामने घेर में बैठे पुलिस कर्मी उधर से गुजरने वाले हर शख्स पर पैनी निगाह रखे हुए थे। दयाराम सिंह की बड़ी पुत्री ममता घेर में बने बाथरूम में थी। छोटी बेटी पूजा उसके इंतजार में गेट पर ही खड़ी थी। दयाराम सिंह के साले गांव अतरासी निवासी महानंदन और एक महिला रिश्तेदार घेर में पशुओं की सानी कर रहे थे। ममता बाहर निकली तो पूजा ने साबुन से उसके हाथ धुलवाए और बाद में दोनों बहनें सिर झुकाकर घर में चली गईं। इस दौरान अमर उजाला ने दोनों बहनों से बात करनी चाही लेकिन पुलिसकर्मियों ने अफसरों के आदेश का हवाला देते हुए रोक दिया। कहा कि इनसे बात करने की इजाजत किसी बाहरी शख्स अथवा मीडिया को नहीं है। एक पुलिस अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया। कहा कि जब हत्या हुई और दयाराम सिंह का पूरा शरीर गोलियों से छलनी हो गया तो वहीं मौजूद उनकी पुत्री ममता और पूजा ने बताया था कि उनके पिता को दिल का दौरा पड़ा है। इंस्पेक्टर जयवीर सिंह का कहना है कि अभी जल्दबाजी में कुछ नहीं कहा जा सकता है। पुलिस कई बिंदुओं पर काम कर रही है और शीघ्र ही खुलासा कर दिया जाएगा। बता दें कि 13 मार्च को दयाराम सिंह की उनके आवास पर ही गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई थी। वहीं मौजूद उनकी बड़ी पुत्री ममता ने उन्हें हार्टअटैक आना बताया था। अगले दिन शनिवार को अंत्येष्टि को ले जाते समय उनकी सलहज वीरवती ने उनके शरीर पर गोलियों के निशान देखकर शोर मचा दिया और बाद में मामला थाने तक जा पहुंचा। बाद में पुलिस को घटनास्थल से पिस्टल की गोलियों के छह खाली खोखे बरामद हुए थे। इस मामले में मृतक की पुत्री ममता की ओर से अज्ञात के खिलाफ उसके पिता की गोली मारकर हत्या की रिपोर्ट भी दर्ज है।
मामले में सुलग रहे सवाल
-दयाराम की हत्या के लिए छह गोलियां चलाई गई थीं, इनमें से पांच के निशान उनके शरीर में मिले, फिर भी चंद मीटर की दूरी पर मौजूद बेटियों को गोलियों की आवाज क्यों नहीं सुनाई दी
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-पांच गोलियां लगने के बाद तो किसी भी शख्स से खून का फव्वारा फूट पड़ा होगा, क्या दयाराम की हत्या के बाद उस दुकान की धुलाई सफाई की गई थी
-फायरिंग की आवाज सुनकर पड़ोसी तक आ गए, इसके बाद भी दयाराम की बेटियों ने पड़ोसियों को यह कह कर क्यों गुमराह किया कि उनके पिता को दिल का दौरा पड़ा है
-किसी सरकारी अस्पताल में ले जाने के बाद बेटियां निजी डाक्टरों के पास क्यों गईं, जब एक डाक्टर ने मृत घोषित कर दिया तो फिर चार-चार जगह दिखाने की जरूरत क्यों समझी, इनमें से एक भी प्रशिक्षित चिकित्सक नहीं था
-आनन-फानन में शव को गांव में क्यों ले जाया गया और दाहसंस्कार की तैयारी क्यों की गई।
-सलहज ने पहली चादर ससुराल की डालने की बात कहकर अर्थी पर लिटाए शव से कफन भी क्यों उठवाया, चादर ऊपर से भी डाली जा सकती थी।
--दयाराम के दोनों बेटों को मानसिक रूप से बेहद कमजोर बताया जा रहा है, दोनों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न की शिकायतें हुई थीं, छोटे बेटे के खिलाफ तो मुकदमा भी चल रहा है, क्या मानसिक रूप से कमजोर शख्स दहेज उत्पीड़न कर सकता है
-दयाराम की संपत्ति एक करोड़ रुपये से ज्यादा की बताई गई है, क्या उनकी हत्या संपत्ति हथियाने के चक्कर में तो नहीं की गई
-जिस पिस्टल से हत्या की गई, वह बरामद नहीं हुई, इसके बाद भी पुलिस उसे सिर्फ बोर के आधार पर लाइसेंसी क्यों बता रही है
एक ही शख्स ने चलाई होंगी गोलियां : पुलिस
गजरौला। पुलिस के मुताबिक रिटायर्ड कानूनगो दयाराम सिंह की हत्या .032 के लाइसेंसी पिस्टल से की गई थी। शव को देखकर लग रहा था कि उन पर छह गोलियां किसी एक ही शख्स ने चलाई होंगी। हालांकि यह नहीं कहा जा सकता कि मारने वाला अकेला अथवा किसी के साथ रहा होगा। कस्बा चौकी इंचार्ज एसआई रजनीश कुमार ने बताया कि मृतक की बेटियों द्वारा हत्या को हार्टअटैक बताना ही पुलिस को परेशान कर रहा है।
सादगी भरा जीवन जी रहे थे दयाराम सिंह
गजरौला। बुलंदशहर में कानूनगो के पद से रिटायर्ड होने के बाद ही दयाराम सिंह ने यहां रेलवे स्टेशन के बाहर मोहल्ला शिवपुरी में ऑन रोड बाजार में स्थित आवास के बाहर वाले कमरे में कास्मेटिक की दुकान खोली थी। परिजनों एवं पड़ोसियों के मुताबिक वह बेहद सादगी भरा जीवन जीते थे। बड़ी संपत्ति के मालिक होने के बावजूद वह अपने गांव की दूरी साइकिल से ही तय किया करते थे। दुकान खोलने का उद्देश्य भी केवल समय व्यतीत करना था। एक मोटी धनराशि हर माह उन्हें पेंशन के रूप में मिलती थी।
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