ऐसे ही अमरोहा की प्रोफेसर डा. तसनीम फात्मा ‘अमरोहवी’ की सामाजिक रिश्तों पर लिखी कहानियां और किताबें वहां की एक छात्रा को पसंद आईं तो उसने प्रोफेसर की अदबी खिदमात पर शोध करना ठान लिया। पाकिस्तान के फैसलाबाद विश्वविद्यालय ने शोध के लिए छात्रा के इस विषय को मंजूर कर लिया है।
तसनीम फात्मा जोया के अब्दुल रज्जाक डिग्री कालेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। तसनीम की कहानियां ‘आधा चांद, रस्सी फांदती लड़की, एक टुकड़ा आग की खातिर, मेमना, मिनी क्वीन’ आदि पाकिस्तान की मैग्जीन और अखबारों में प्रकाशित हुई हैं।
उनकी किताबें खासतौर पर जॉकी: तखलीक और मुकालमा, अफसाना निगार, लेख- कितने पाकिस्तान, पॉकेमान की दुनिया, शेक्सपीयर की ड्रामा नगरी, आतिशे रफ्ता का सुरंग, छोटी कहानियाें में- मां-बाप आदि में सामाजिक रिश्तों को कहानियों में पिरोया गया है। ये कहानियां पाकिस्तान में बेहद पसंद की गईं। तसनीम की कहानियों में बूढ़े मां-बाप का दर्द इतनी बारीकी से दर्शाया गया है कि कहानी पढ़ते वक्त आंखों से आंसू बहने लगते हैं।
इस तरह तसनीम की कहानियों से प्रेरित होकर पाकिस्तान की फैसलाबाद यूनिवर्सिटी ने वहां की छात्रा हिना मुबीन के शोध विषय डा. तसनीम फात्मा की अदबी खिदमात को मंजूरी दे दी है।
डा. तसनीम फात्मा मेरठ में पैदा हुईं और पली बढ़ीं। अमरोहा के बिजनेसमैन परिवार में उनका निकाह हुआ। अब पूरी तरह अमरोहा में वह परिवार के साथ रहती हैं और उनके पति जुहैर अब्बास नकवी हैंडलूम का कारोबार करते हैं।
डा. तसनीम फात्मा के वृत्तचित्र दूरदर्शन पर छा चुके हैं। आबरू-ए-गजल और किताबों के रंग के 52 एपिसोड डीडी-उर्दू पर, रात चांद और चोर डीडी-वन पर 12 एपिसोड, मेरा ख्वाजा सूफी विजन टेलीफिल्म और दो वृत्तचित्र मेरठ की चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से संबंधित डीडी वन पर प्रसारित हो चुके हैं। मिनी क्वीन की कहानी आल इंडिया रेडियो पर भी प्रसारित हुई है।
डा. तसनीम के लिए उर्दू एकेडमी की ओर से कई अवार्ड मिल चुके हैं। आल इंडिया रेडियो से प्रसारित मिनी क्वीन की कहानी पर पुरस्कार, मेरठ यूनिवर्सिटी से गोल्ड मेडल, उर्दू एकेडमी की ओर से उर्दू में आलोचना और समालोचना में भी हाल ही में पुरस्कार मिला है।